“हमें अपने अस्तित्‍व को सेलिब्रेट करना आना चाहिए”, ताहिरा कश्यप खुराना

Published on: 29 October 2020, 16:00 pm IST

हेल्थशॉट्स के साथ अपने साक्षात्कार में ताहिरा कश्यप खुराना अपनी किताब '12 कमांडमेंट्स ऑफ बीइंग अ वुमन', ब्रेस्ट कैंसर के साथ अपने सफर और फेमिनिज्‍़म पर अपने विचार साझा कर रहीं हैं।

ताहिरा कश्यप खुराना
ताहिरा कश्यप खुराना

बिंदास और अपनी भावनाओं के प्रति ईमानदार, जब आप ऑथर, स्क्रीनप्ले राइटर और फिल्ममेकर ताहिरा कश्यप खुराना की बात करते हैं, तो उनके ये गुण आपके दिमाग मे जरूर आते हैं। वह जो महसूस करती हैं, वह बोलती हैं; अपने शब्दों को घुमाती नहीं हैं, ईमानदारी से अपने दिल की बात कहती हैं- और उनकी यही बात उन्हें सभी का फेवरेट बनाती है।

एक कैंसर सर्वाइवर के रूप में ताहिरा सभी के लिए प्रेरणा हैं। वह कभी भी अपने संघर्षों को साझा करने में झिझकती नहीं हैं और अपनी रिकवरी के बारे में खुल कर बात करती हैं। ताहिरा जो बताती हैं उसमें सच्चाई होती है।

हाल ही में उन्होंने अपनी नई और चौथी किताब ’12 कमांडमेंट्स ऑफ बीइंग अ वोमेन’ से इंटरनेट पर धूम मचा रखी है। और हमेशा की तरह उन्होंने इस किताब को अपने खास अंदाज में ही लिखा है।

ताहिरा कश्यप खुराना
ताहिरा कश्यप खुराना

ताहिरा ने हेल्थशॉट्स से बात करते हुए अपनी किताब, अपने ब्रेस्ट कैंसर से संघर्ष और फेमिनिज्‍़म पर अपने विचारों पर प्रकाश डाला है।

महिला-प्रधान कहानियों के बढ़ते चलन पर

एक कहानीकार के तौर पर ताहिरा मानती हैं कि महिलाओं की कहानियां अब भी सामने नहीं आती हैं, जिस तरह आनी चाहिए।
“मुझे नहीं पता क्यों और कैसे, लेकिन मैं महिलाओं की कहानी के प्रति अपने आप ही खिंची चली जाती हूं। उन कहानियों से एक गहरा संबंध महसूस होता है। जो भी स्क्रीनप्ले मैंने लिखें हैं, उनमें महिलाओं के किरदार को गढ़ना आसान होता है, क्योंकि वह कहीं ना कहीं मेरे अंदर से आता है। जब पुरुषों की बात आती है, मुझे उन किरदारों के लिए बहुत सोचना पड़ता है। मेरे मन में महिलाओं की कहानियां भरी हुई हैं और मैं इंतजार करती हूं कैसे यह कहानियां सुनाने का मौका मिले।”

उनकी नवीनतम पुस्तक की यात्रा

यदि आप ताहिरा के इंस्टाग्राम पोस्ट को फॉलो कर रहे हैं, तो आप जानते होंगे कि वह हमेशा से कितनी साधारण और भरोसेमंद रही हैं। यही वह गुण है जो जगर्नोट बुक्स के सह-संस्थापक और प्रकाशक चिकी सरकार की नजर में आया।

ताहिरा बताती हैं, “चिकी ने मेरे कुछ पोस्ट और लेखों को देखा, और साथ कम करने के लिए मेरे पास आईं। पुस्तक का पहला अध्याय मैंने उसके साथ साझा किया था, और वह आश्चर्य में थी। फिर उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मेरे पास इस तरह के और भी किस्से हैं, तो मेरा जवाब था “मेरे पास कई हैं”। हम सभी का एक किस्सा है, जब से आप अपने बचपन से किशोरावस्था में पहुंचे हैं, और फिर अपने 20s और 30s के भी। मैंने इसी तरह के अनुभवों का मंथन कर, एक के बाद एक यह कमांडमेंट्स खोज निकालें।”

ताहिरा कश्यप खुराना

जब ताहिरा ने यह सोचा कि ये सब उसके जीवन के विभिन्न चरणों में ‘एक महिला होने के नाते’ हुआ है, तो उन्होंने अपनी पुस्तक का नाम ‘12 कमांडमेंट्स ऑफ बीइंग अ वोमेन’ रखा।
ताहिरा कहती हैं, “यह किताब महिलाओं और पुरुषों दोनों के लिए बनी है।”
वह मानती हैं कि दुनिया ने महिलाओं को “सुपरहीरो” बना दिया है, हालांकि हम में से हर एक का जीवन इससे कहीं ज्यादा है।

“महिलाओं के रूप में, हम अपनी एक अत्यधिक पवित्र छवि नहीं चाहते हैं कि “बाकी कोई और गलत हो सकता है, पर मां गलत नहीं हो सकती। मुझे ऐसा महसूस होता है कि यह एक दबाव है और ईमानदारी से कहूं तो मैंने इसका पालन कभी नहीं किया है। मैंने अपनी पुस्तक में भी विभिन्न घटनाओं के माध्यम से इसे स्वीकार किया है।
ताहिरा कहती हैं, महिलाओं के रूप में, हम हमेशा जिस तरह से दिखते हैं, उसके बारे में तनावग्रस्त रहते हैं।

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“आप एक किशोर के रूप में आकर्षक हो सकती हैं या आप आगे चलकर अधिक खूबसूरत होती हैं, लेकिन ये बातें आपके दिमाग में चलती हैं। मुझे लगता है कि इस बारे में कुछ लिखा या कहा नहीं गया है। मुझे याद है कि मैं अपनी हम उम्र लड़कियों में ब्रा पहनने वाली या पीरियड्स होने में आखरी लड़की थी।

मैंने अपनी किताब में इस बात पर चर्चा की है कि मैंने इसे कितनी गंभीरता से लिया था और इसने मुझे कितना परेशान किया। मैंने अपनी मां पर मुझे कई डॉक्टरों के पास ले जाने का दबाव डाला, क्योंकि मेरी धारणा में यह एक गड़बड़ थी। ऐसा इसलिए है क्योंकि जब आप एक बच्चे होते हैं, तो बहुत सारी चीजें स्पष्ट नहीं होती हैं।”

कैंसर से लड़ाई पर

अक्टूबर ब्रैस्ट कैंसर जागरूकता माह है और खुद ताहिरा ने ब्रेस्ट कैंसर से लड़ाई की है। उस समय के दौरान उनकी मानसिकता और संघर्ष के बारे में पूछे जाने पर, वह कहती है:

“मुझे लगता है कि यह पल-पल का संघर्ष है और यह हमारे जीवन के बाकी हिस्सों में भी विभिन्न तरीकों से मौजूद है। हो सकता है कि कैंसर से किसी को वह दुख न मिले, जितना दिल टूटने पर होता है, इसलिए मुझे लगता है कि यह सब बहुत मायने नहीं रखता है। इसका मतलब यह नहीं है कि एक समस्या दूसरे की तुलना में अधिक गंभीर है, सिर्फ इसलिए कि मुझे ऐसा लगता है।

मुझे लगता है कि हम जीवन भर किसी न किसी बाधा का सामना करते हैं, और हमारे पास हमेशा एक विकल्प होता है। क्या आप उन कारणों के साथ समझौता करने जा रहे हैं जो जीवन के अनुकूल पक्ष की ओर झुकाव करते हैं, या आप “यह मेरी स्थिति है, मुझे इसमें ही खुद को बेहतर बनाना है” की ओर झुके हैं। मुझे लगता है कि आपको यह तय करना है कि आप क्या पक्ष चुनाव करते हैं।”

ताहिरा कश्यप खुराना

मानसिक स्वास्थ्य पर बातचीत

वह मानती हैं कि मानसिक स्वास्थ्य के विषय मे अधिक बातचीत करने की आवश्यकता है, ताकि लोग अधिक जागरूक हों और इसे “एक नखरे दिखाने” के लिए एक फैंसी शब्द के रूप में न समझें।
“मुझे लगता है कि मानसिक स्वास्थ्य से पीड़ित लोगों के लिए महामारी ने वास्तव में समस्याओं को बढ़ाया है, क्योंकि शायद ही कोई ह्यूमन कनेक्टिविटी, अभिव्यक्ति और संचार हुआ है। हां, मैंने भी अतीत में इस तरह कुछ सहा है। लेकिन चूंकि, मैं डॉक्टर के पास नहीं गयी, मैं यह नहीं कह सकती कि यह अवसाद था। मेरे पास मेरे तनाव के दौरे हैं, और यह बहुत सहज एहसास नहीं था। यह सिर्फ दुख नहीं है, यह उससे कहीं अधिक है”, ताहिरा कहती हैं।
वह यह भी महसूस करती हैं कि लोग मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों को “अलग” मानते हैं, जब वास्तविकता में, दोनों साथ काम करते है।

ताहिरा कहती हैं “मैंने मानसिक तनाव और चिंता के कारण शारीरिक समस्या पायीं हैं। अपनी बात करूं तो आज भी इर्रिटेबल बॉउल सिंड्रोम मुझे एंग्जायटी और तनाव के कारण ही जाता है। एक समय मे यह सब बहुत गंभीर था क्योंकि मैंने फालतू डाइट का पालन किया था, और मैंने किताब में इस बारे में भी बात की है।”

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“जब नारीवाद की बात हो, तो कुछ प्रगति हुई है”, ताहिरा मानती हैं

ताहिरा ने पहले एक पत्र लिखा था, जिसमें उन्होंने लिंगवाद यानी सेक्सिज्‍़म के बारे में बताया था, जैसा वह हर रोज महसूस करती है। इस अंतर्निहित पितृसत्ता के खिलाफ उनकी लड़ाई के बारे में भी बात करती हैं। हालाकि अभी एक लंबा रास्ता तय करना है, उन्हें लगता है कि “हम नारीवाद को गले लगाने की राह पर हैं।”

वह कहती हैं, “अच्छा भाग यह है कि हम नारीवाद के बारे में बात कर रहे हैं, यह चारों ओर सुर्खियों में हैं। इससे पता चलता है कि हमारे समाज में इस विषय में विकास हुआ है। यह उस समय से कितना अलग है जब अभिव्यक्ति एक विकल्प नहीं थी, और पिछली पीढ़ियों ने ऐसा समय देखा है। हम भी पीड़ित हैं, लेकिन कम से कम हम बात कर रहे हैं। इसलिए, मुझे आशा है कि जब हम अगली पीढ़ी के लिए आगे बढ़ेंगे, तो वे निष्पादक होंगे, और वे किसी भी प्रकार की असमानता नहीं देखेंगे। ताकि हम एक समान समाज की ओर बढ़ सकें। मुझे ईमानदारी से लगता है कि सोशल मीडिया ने भी नारीवाद को बहुत गति दी है और लोगों की राय भी बदली है।”

महिलाओं और उनके कमांडमेंट्स पर

“मुझे लगता है कि एक महिला होने का सबसे अच्छा हिस्सा एक महिला होना है। उनके पास कमांडमेन्ट का अपना सेट होना चाहिए, इसलिए ऐसा नहीं है कि मैंने 12 कमांड लिखे हैं और सभी को उनका पालन करना होगा। मुझे लगता है कि हम सभी इंसान हैं, और महिलाओं के रूप में, हमें वास्तव में हमारे व्यक्तित्व का जश्न मनाने की आवश्यकता है। हमारे पास नियमों का अपना सेट होना चाहिए। ताहिरा कहती हैं, “किसी और के नियम का पालन न करें, अपने नियमों को खुद बनाएं। आप के अपने कमांडमेंट्स हैं।”

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