कैंसर से पहले और बाद में भी मैं गीता गैरोला ही हूं, पढ़िए थर्ड स्टेज पेट के कैंसर को हराने वाली एक विजेता की कहानी

फीमेल एक्टिविस्ट और साहित्यकार गीता गैरोला ने थर्ड स्टेज में पेट के कैंसर को मात देते हुए यह साबित कर दिया है कि हेल्दी लाइफस्टाइल और पॉजिटिव सोच के साथ कुछ भी संभव है।
पढ़िए गीता गैरोलो की कैंसर से लड़ाई की साहस भरी कहानी। चित्र शटरस्टॉक।
अंजलि कुमारी Published on: 25 November 2022, 17:58 pm IST
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थर्ड स्टेज के पेट के कैंसर (3rd stage stomach cancer) को हराने के बाद गीता गैरोला आज एक स्वस्थ जिंदगी जी रही हैं। 60 वर्ष की गीता गैरोला एक सोशल एक्टिविस्ट हैं इसके साथ ही वह लेखन में भी सक्रिय हैं। उन्होंने अपनी कैंसर रिकवरी पर भी एक किताब लिखी है। इसके अलावा उनकी लिखी कई अन्य मोटिवेशनल किताबे भी लोगों को प्रेरणा दे रहीं हैं। कैंसर से उबरने के बाद अब गीता कैंसर पीड़ितों का हौसला बढ़ाने के लिए कॉउंसलिंग किया करती हैं। उनके अनुसार कैंसर पीड़ितों के लिए सकारात्मकता बहुत जरुरी है। आइए जानें कैंसर की मरीज से मोटिवेशनल स्पीकर और काउंसलर बनने तक की उनकी कहानी ( Geeta gairola’s struggle with stomach cancer)।

कब हुआ कैंसर से सामना

54 साल की उम्र में उन्हें पेट का कैंसर (Stomach Cancer) डिटेक्ट हुआ था। पेट का कैंसर भारत में कैंसर से होने वाली मौतों का दूसरा सबसे बड़ा कारण है। इसके साथ ही यह चौथा सबसे आम कैंसर है। हालांकि, थर्ड स्टेज (3rd stage) के कैंसर को हराने के बाद गीता ने कैंसर से पीड़ित लोगों के लिए एक मिसाल कायम की है। गीता ने हेल्थ शॉट्स के साथ बातचीत के दौरान कई सकारात्मक और हौसला देने वाली बातें शेयर की। तो चलिए जानते हैं उनकी बहादुरी और जिंदादिली के बारे में।

आसान नहीं तो, असंभव भी नहीं है थर्ड स्टेज के कैंसर से लड़ना

गीता गैरोला को अपने कैंसर का पता तब चला जब वह थर्ड स्टेज में पहुंच चुका था। जाहिर सी बात है, यह उनके लिए एक बहुत बड़ा सदमा था। गीता बताती हैं कि “उनके अपेंडिक्स का आकार हथेली के जितना बड़ा हो चुका था। जिसने इंटेस्टाइन और गॉल ब्लैडर के बीच एक बहुत बड़ा पैच बना दिया था। इन्फेक्शन बढ़ने के कारण कैंसर थर्ड स्टेज पर पहुंच चुका था।

वे बताती हैं, “मुझे 54 की उम्र में अपने कैंसर का पता चला। कैंसर का पता लगने के बाद लगभग 15 से 20 मिनट के लिए मैं बिलकुल शॉक में थी, लेकिन फौरन मैंने खुद को याद दिलाया कि कैंसर तो बहुत लोगों को होता है। मैं कोई खास तो हूं नहीं कि मुझे कैंसर नहीं हो सकता। इसी बात को मैंने अपना हौसला बनाया और अपने अंदर जीने की एक नई ख्वाहिश पैदा की। मैंने खुद से कहा कि जो होगा देखा जाएगा। मैं आज से ही जीना कैसे छोड़ सकती हूं।”

आसान नहीं तो, असंभव भी नहीं है थर्ड स्टेज के कैंसर से लड़ना. चित्र शटरस्टॉक।

जिंदादिली है हर जीत की कुंजी

कैंसर एक ऐसी बीमारी है जिसमें मौत सामने दिखाई देती है। हर वक़्त मन में एक खौफ बना रहता है। गीता कहती हैं कि “ऐसा नहीं था कि मुझे मौत से डर नहीं लगा पर मैंने अपने इस भय को कभी अपनी हिम्मत पर हावी नहीं होने दिया। यह बात आम लोगों के लिए समझना थोड़ा मुश्किल होगा, पर सच यह है कि कैंसर का मरीज न केवल शारीरिक रूप से बल्कि मानसिक रूप से भी मरने लगते हैं।

हालांकि, शुरूआती दौर में थोड़ी मुश्किल थी, परन्तु मैंने अपने दिमाग को कभी हारने नहीं दिया। पूरे दिन मोटिवेशनल किताबे पढ़ी, फेसबुक, ट्वीटर पर लोगो से जुडी उनसे बातचीत की। इन सभी चीजों ने मुझे दिमागी रूप से काफी मजबूत बना दिया।”

उन्होंने आगे कहा कि “जब मै कीमो ले रही होती थी या अस्पताल में मरीजों के साथ होती थी, हमेशा कैंसर या किसी तरह की नकारात्मक बातें करने से परहेज करती थी। मैं अकसर साहित्यिक, तो कभी एक्टिविज्म इत्यादि पर चर्चा किया करती थी। कैंसर के दौरान लोग नकारात्मकता के प्रति बहुत जल्दी आकर्षित होते है। इसलिए यह परिवार के लोगों, और दोस्तों की जिम्मेदारी है कि मरीज के आसपास के वातावरण को सकारात्मक बनाए रखें।

इतना ही नहीं मेरे साहित्य ने मुझे बहुत ऊर्जा दी। इसी प्रकार हर व्यक्ति का अपना एक अस्तित्व होता है, यदि वह उसका सहारा लेंगे तो उनके लिए भी खुद को मजबूत बनाना आसान हो जायेगा।”

गंजेपन को बनाया अपना दोस्त

गीता गैरोला को कैंसर के दौरान 8 कीमो लेने थे। कीमो चढ़ना कोई सामान्य बात नहीं है एक असहनीय दर्द से गुजरना पड़ता है। एक ही दर्द को 8 बार झेलना गीता के लिए भी आसान नहीं था। परन्तु उनकी जिंदादिली और हौसले ने इस पर भी जीत हासिल की।

वहीं कीमो के साइड इफ़ेक्ट के तौर पर लोगों को गंजेपन का सामना करना पड़ता है। महिलाओं को अपने बालों से एक अलग सा लगाव होता है। गीता ने गंजेपन को भी पूरे आत्मविश्वास और सहस के साथ अपना साथी बना लिया।

अपने गंजेपन पर गीता कहती हैं कि “मुझे अपने बालों से बहुत ज्यादा प्यार था। मेरे बाल काफी घने, लम्बे और खूबसूरत हुआ करते थे। मैं इनकी देखभाल में भी किसी तरह की कमी नहीं करती थी। परन्तु कीमो के दूसरे डोज के बाद मेरे बालों पर साइड इफ़ेक्ट नजर आने लगे। हालांकि, शुरुआत में यह मेरे लिए भी काफी कठिन था, परन्तु मैंने इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। मैंने धीरे-धीरे बालों के झड़ने का इंतजार नहीं किया, बल्कि शुरुआत में ही अपने सारे बाल हटवा लिए।”

कैंसर एक ऐसी बीमारी है जिसमें मौत सामने दिखाई देती है। चित्र शटरस्टॉक।

“मैंने कभी स्कार्फ आदि से इसे छिपाने की कोशिश नहीं की। मुझे अपने गंजेपन पर थोड़ी सी भी सर्मिंदगी नहीं थी। न केवल बाल, बल्कि पलकें और भौवों के बाल भी पूरी तरह झड़ गए थे। मैं बिलकुल इसी तरह अपने कार्यालय जाया करती थी। मेरा नाम गीता गैरोला है और गंजे होने के बाद भी मैं गीता गैरोला ही थी।

यह मेरे इलाज का एक हिस्सा था और कैंसर एक बीमारी है यह किसी भी तरह से शर्मिंदगी की बात नहीं है। कैंसर के बाद भी लोगों ने मुझे एक मरीज के तौर पर नहीं, बल्कि गीता गैरोला के तौर पर ही स्वीकारा। मैंने खुद को कभी केवल मरीज नहीं समझा।”

खुद को मानसिक रूप से व्यस्त रखना है जरुरी

कैंसर के दैरान यदि आप पूरी तरह खाली हैं, तो यह आपके लिए खतरनाक हो सकता है। इसलिए इस दौरान खुद को व्यस्त रखने की कोशिश करें। गीता कहती हैं कि “कैंसर के इलाज के दौरान जब भी मुझे ठीक लगता था या जब मैं थोड़ा भी ताकत महसूस करती थी, तो सभी मीटिंग, धरने, साहित्यिक समारोह में जरूर भाग लेती थी।

हां ये है कि मैं सबसे दूर कहीं पीछे खड़ी रहने की कोशिश करती थी। ताकि अन्य लोगों तक इन्फेक्शन न फैले। इस दौरान मानसिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए सभी को अपनी मनपसंदीदा गतिविधियों में भाग लेते रहना चाहिए। यदि आप बाहर जाने की स्थिति में नहीं हैं तो कम से कम घर पर ही अपनी पसंदीदा गतिविधियों को करने की कोशिश करें।”

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लेखक के बारे में
अंजलि कुमारी

इंद्रप्रस्थ यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म ग्रेजुएट अंजलि फूड, ब्यूटी, हेल्थ और वेलनेस पर लगातार लिख रहीं हैं।

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