जानिए कैसे एक बारहवीं फेल लड़की आज बन गई है पूरे झारखंड और भारत की पहचान

Updated on: 21 May 2022, 21:19 pm IST

दसवीं और बारहवीं के एग्जाम में अच्छे नंबर लाने के लिए विद्यार्थी ही नहीं, उनके पेरेंट्स भी जान हलकान कर लेते हैं। पर मेघा की कहानी बताती है कि ये नंबर किसी के मुकद्दर की चाबी नहीं हैं।

chhote shahar ko di badi pahchaan
छोटे शहर को दी बड़ी पहचान

झारखंड राज्य के शहर डाल्टन गंज में एक लड़की रहती थी। थोड़ी गुमसुम थोड़ी उदास। जिसका पढ़ने-लिखने में मन ही न लगता। गुमसुम रहने का कारण यह कि यूं तो वैसे भी वह पढ़ने लिखने में कोई बहुत अच्छी नहीं थी उस पर बारहवीं क्लास में वह फेल हो गई। फेल हो जाना तो यूं भी पाप जैसा ही है। ऐसा जैसे ‘गुड फॉर नथिंग’ होने का सर्टिफिकेट मिल जाना। हिंदी मीडियम स्कूल में पढ़ने वाली इस मामूली सी लड़की का भविष्य लोगों की ही तरह उसे भी अंधकारमय लगने लगा। उसने भी लोगों की बातों में आ कर मान ही लिया कि अब कहीं कुछ नहीं बचा। पर लड़की को अपने माथे पे लगा यह फेलियर होने का धब्बा साफ करना था। कि बस तभी लाइफ में एंट्री हुई हीरो की। यह हीरो था संगीत। ये लड़की है डाल्टनगंज की मेघा डाल्टन, जो आज संगीत की दुनिया में जाना माना नाम है। आइए जानते हैं मेघा का सफर (Megha dalton success story), खुद उन्हीं की जुबानी।

ये सीढ़ियां संगीत की थीं 


संगीत की ही उंगली थाम लड़की सीढ़ी दर सीढ़ी आगे बढ़ती गई और फोक म्यूज़िक की आवाज  पर्याय माने जाने वाले मंच कोक स्टूडियो पहुंच गई। शिवाय जैसी बड़ी फ़िल्म के गाने गाने के साथ ही गांधी और अपनी ज़मीन से जुड़े गीतों को अपना साथी बना लिया। यह लड़की थी मेघा जिसने विश्व के मानचित्र पर नज़र तक ना आ पाने वाले झारखंड के डाल्टन गंज को अपने नाम से पहचान दी। आज वे इस शहर की पहचान बन चुकी हैं। और लोग उन्हें मेघा श्रीराम डाल्टन के नाम से जानने लगे हैं। 

चोर दरवाज़े से आया मेरा हीरो

मेघा की ज़िंदगी में उनका हीरो बाइक पर या घोड़े पर नहीं बल्कि चोर दरवाज़े से आया। मेघा के ही शब्दों में म्यूजिक सीखना शुरू करने के पीछे बड़ी ही इंटरेस्टिंग कहानी है। दरअसल हुआ यूं कि संगीत शिक्षक महोदय मेरी दीदी को सिखाने आते थे। दीदी मल्टीटैलेंटेड थीं, उनके जिम्मे पढ़ाई और संगीत ही नहीं पेटिंग आदि भी थे। जिनके बोझ के नीचे वह दबी रहती। तो जब संगीत शिक्षक आते तो उनके सम्मान में मैं उनके पास बैठ जाती। 

अब दिक्कत यह थी कि शिक्षक महोदय सिखाते बहुत कठिन सुर मुरकियों पर उनका गला ऐसा साधा था कि वे मुश्किल तान झट से सुना देते और मैं हर बार कोई न कोई गलती कर ही बैठती। फिर पड़ती छड़ी की मार जिसके डर से मैं उनके सिखाए हुए का अभ्यास करने लगी। संगीत से प्यार तो उस समय हुआ जब मैं कहीं गाने जाती और प्रशंसा, तालियों के साथ पैसे भी मिलते। मैं समझ चुकी थी कि मेरी लाइफ को सिर्फ संगीत ही सुधार सकता है। 

बीएचयू से ली संगीत की शिक्षा

अब बारी थी संगीत को मांजने की और यही सोच कर मैंने बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में संगीत संकाय में एडमिशन लिया। मज़ेदार बात यह है कि उन तीन सालों में मैंने कुछ नहीं सीखा, बल्कि जो आता था उसे ही मांजा। शो किए पैसे लिए और विश्विद्यालय के हर आंदोलन और रैली का हिस्सा बनी। यूनिवर्सिटी ने मुझे कॉन्टेक्ट्स दिए और नाम दिया।

शिवाय बना करियर का टर्निंग पॉइंट

संगीत से इश्क़ अपने परवान पर था और मेघा धीरे-धीरे खुद को निखार रही थीं। इसी बीच वे अपना झोला उठा के मुम्बई भी पहुंच गई, जहां दोस्तों ने ही नहीं बॉलीवुड ने भी उनके अंदर की कला को भांप लिया। थियेटर में काम जारी था। एक दिन किसी दोस्त के कहने पर वे शिवाय के सेट  पहुंच गईं। वहां उन्होंने शिव ओंकार मंत्र के साथ अपनी स्वर लहरियों के साथ सबका मन मोह लिया। कुछ दिनों में फ़िल्म के संगीत निर्देशक का कॉल आया, जिन्होंने बताया कि यह मंत्र फ़िल्म के टाइटल ट्रैक का हिस्सा रहेगा। 

gandhi geeton ko banaya jan zameen se judne kaa zariya
गांधी गीतों को बनाया जन जमीन से जुड़ने का ज़रिया

कोक स्टूडियो से बुलावा 

कहते हैं संजोग तो यूं ही हो जाते हैं ऐसे ही यूं ही बैठे बिठाए अचानक कोक स्टूडियो से कॉल आई। पहले पहल तो मेघा को भरोसा ही नहीं हुआ कि यह कोक स्टूडियो से ही कॉल है। लगा शायद किसी दोस्त ने मज़ाक किया है। फिर जब उन्होंने स्टूडियो का एड्रेस दे कर मेघा को आने को कहा तब जा कर उन्हें यकीन हुआ। ‘मेघा रे’ गाते हुए ना कोई इंस्ट्रूमेंटल सेटिंग्स थी ना कोई रिहर्सल, बस लाइव गाना था। 

गांधी और आंचलिक गीत 

मेघा बताती हैं मैं उस जगह से संबंध रखती हूं जहां जंगल और जीवन एक दूसरे के पर्याय हैं। इसलिए मेरा संगीत पेड़-पौधे और मेरी उसी ज़मीन को समर्पित हैं। ये गाने जिनमें मेरी मिट्टी की खुशबू हैं और यही मेरी पहचान हैं। 

गांधी गीतों को गाने की शरुआत तब हुई जब मैंने गांधी को पढ़ना और उन्हें खुद में उतारना शुरू किया। मैं चाहती हूं कि मेरे गीतों के माध्यम से गांधी व्यक्ति के तौर पर नहीं सूत्र के रूप में घर-घर  तक पहुंचे। उनके विचारों को सुरबद्ध कर मैं उन्हें सबकी पहुंच में लाना चाहती हूं।

 मेडिटेशन को बनाया मानसिक मज़बूती का आधार 

तमाम व्यस्तताओं के बावजूद अशांत मन को शांत करने के लिए मेघा मेडिटेशन के लिए समय निकाल ही लेती हैं। मेघा की बौद्ध धर्म और अघोर पंथ में आस्था उनके जीवन में सकारात्मकता बनाए रखती है। यह उन्हें पॉज़िटिविटी देने का अप्रतिम स्रोत है। इसके अलावा चरखे पर सूत कात कर भी मेघा मन को शांत और संयत करती हैं।

फेलियर से सक्सेस का सफर

फेल होने का मतलब जीवन का ख़त्म होना नहीं होता है। मेघा कहती हैं, “जब फेल हुई तो लगा दुनिया खत्म हो गई फिर समझ आया कि गिरे बिना आप में उठने का हौसला नहीं आता। जीवन की हर परीक्षा के बाद आगे बढ़ने की उम्मीद बनी रहनी बेहद ज़रूरी है। मैंने अपने जीवन में आई हर मुसीबत का सामना करने के बाद ही जाना कि कोशिश करने वालों की हार कभी नहीं हुई और किसी भी चीज़ को खो देने का डर आपकी सफलताओं में रोड़ा अटका सकता है।”

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शालिनी पाण्डेय शालिनी पाण्डेय