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मेरा जन्म एलोपेसिया एरिएटा नामक बालों की लाइलाज बीमारी के साथ हुआ था, यह है मेरी कहानी

Published on:21 September 2020, 17:30pm IST
मिलिये हैदराबाद की रहने वाली 19 वर्षीय सौम्या से जो अलोपिसिया एरिएटा नाम की बीमारी के साथ जी रही हैं। यह उनकी कहानी है, किस तरह से उन्होंने खुद को अपने रूप में स्वीकार कर आत्मविश्वास हासिल किया।
अपनी कहानी, अपनी ज़ुबानी 
एलोपेसिया एरिएटा एक लाइलाज बीमारी है, पर यह आपका आत्‍मविश्‍वास नहीं छीन सकती।

मेरा नाम सौम्या मोदी है और मेरा जन्म एलोपेसिया एरिएटा नामक लाइलाज बीमारी के साथ हुआ था।

यह कोई ऐसी बीमारी नहीं थी जो धीरे-धीरे सामने आई हो। मुझे जन्म से ही इससे जूझना पड़ रहा है। बचपन में ही मेरे बाल बेतरतीब ढंग से झड़ने लगे थे। मेरे सिर के बाल कई जगहों से तो बिलकुल ही गायब हो गये थे। इस असामान्य घटना ने मेरे माता-पिता को परेशान कर दिया। फिर उन्होंने डॉक्टर से मिलने का फ़ैसला किया। सो मेरे जन्म के कुछ महीनों बाद ही यह सामने आ गया कि मैं एलोपेसिया एरिएटा से ग्रस्त हूं।

शुरुआती कुछ दिनों तक वे इसे मानने को तैयार न हुए। उन्होंने मेरे बाल इस उम्मीद में मुंडवाये कि शायद फिर सही से आने लगे। लेकिन यह तरकीब बिलकुल नाकामयाब साबित हुई। मैं उस वक्त कुछ ही महीनों की थी।

अलग रंगरूप के साथ समाज में बड़े होना

उम्र के साथ मेरे बाल कम होते चले गये। मेरे माता-पिता चिंतित रहने लगे थे। ये एक ऐसी बीमारी थी जो मेरे आसपास किसी को भी नहीं थी। हमने इसके साथ रहना सीखा।

बीमारी की पहचान ताकि उसका इलाज ढूंढा जा सके

शुरुआत में मैं इस स्थिति के बारे में ज्यादा नहीं जानती थी। काफी बाद में मैंने इस बीमारी का नाम पहली बार सुना। मैं जितने डॉक्टरों के पास गई, सबने अलग-अलग इलाज बताये। उनमें से ज्यादातर घरेलू नुस्खे थे। जैसे हर्बल पत्तियों के पेस्ट लगाना। मैंने विटामिन बी12 और D जैसे कुछ सप्लीमेंट्स भी लिये।

मेरी बीमारी दुर्लभ थी जिसका कोई इलाज नहीं दिखता था।

एलोपेसिया एरिएटा कैसे और क्यों होता है, इस बारे में बहुत कम शोध किये गये हैं। मुझे बस इतना पता था कि ये मेरे साथ उम्र भर रहने वाला है। डॉक्टरों ने बताया कि ये एक जेनेटिक बीमारी है। पर उन्हें भी जीन्स के म्युटेशन की विशेष जानकारी नहीं थी और न ही इसे रोकने की।
डॉक्टरों के पास भी अपने-अपने अनुमान थे। किसी ने कैल्शियम लेने की तो किसी ने अधिक से अधिक दूध पीने की सलाह दी। पर इन सबसे कोई फायदा नहीं हुआ। फिर मैंने अपनी इस स्थिति के साथ जीना सीख लिया।

एलोपेसिया एरिएटा के साथ जीने की कोशिश

मुझे मेरे 8वीं क्लास का एक वाकया आज भी अच्छी तरह से याद है। जब मैं समर कैंप के लिये कुछ दूसरे बच्चों के साथ इंडोनेशिया गई थी। वहां जब बात कैंप लीडर चुनने की आयी तो मैं कोशिशों के बावजूद नहीं चुनी गयी क्योंकि शायद मैं उन लोगों से अलग दिखती थी। जिससे वे कम्फर्टेबल नहीं थे। वैसे भी एक गंजी लड़की, वो भी कंफीडेंस के साथ, कम ही दिखती है।

फिर से कॉन्फिडेंस और सपोर्ट सिस्टम बनाना

आपको मेरे नजरिये को देखकर आश्चर्य हो सकता है कि किस प्रकार मैं एलोपेसिया एरिएटा के साथ सहज हो गयी। खास तौर से उस उम्र में जब हमें अपने लुक्स की चिंता अधिक होती है। सच कहूं तो इसने मुझे कभी उस तरह से प्रभावित नहीं किया।

मैं पूरी कॉन्फिडेंट थी, खासतौर पर अपने शरीर के लिये। मुझे दूसरों से अलग होना खुशी देने लगा था। यह मुझे भीड़ से अलग करती थी।

कुछ सबक जो मैंने सीखे

जब मैं पहली बार कॉलेज जाने वाली थी तो मेरे माता-पिता ने विग के लिये पूछा। मैंने ‘हां’ कहा। पर इसके साथ ही मैंने यह निर्णय भी लिया कि शुरुआत में मैं अपने असली रूप में ही कॉलेज जाऊंगी। एक बार सेटल होने के बाद ही विग पहनना शुरू करूंगी। मैं जागरूकता फैलाना चाहती थी न कि अपनी स्थिति छुपाना।

मैं अक्टूबर 2019 से मार्च 2020 तक विग लगाकर कॉलेज गयी। इसके बाद से लॉकडाउन के चलते घर पर हूं। अब मैं अपनी पसंद के अनुसार कभी विग पहनती हूं और कभी ऐसे ही रहती हूं। अब विग मेरे लिये मात्र दूसरे सामान की तरह है जैसे कि मेरा जैकेट। जिसे मैं अपनी रुचि के अनुसार पहन या छोड़ सकती हूं।

मैंने एक विग बनाने वाली कम्पनी में काम किया है। मेरा इस तरह के सवालों से अक्सर सामना होता रहा है कि ‘तुम लोगों से कहती हो कि अपने आप से खुश हो और विग से खुद को बदलने की भी कोशिश करती हो।’

तो मैं वैसे लोगों से कहना चाहूंगी कि आपके दिखने भर से आप में कोई बदलाव नहीं आ जाता। अपने आप को प्यार करना और अपनी पसंद की चीजें करना दोनों साथ-साथ चल सकती हैं।

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