फॉलो

यहां है एक ऐसी ‘प्राउड फेलियर’ की कहानी,जिसने बदल दिया जीत का अर्थ

Updated on: 15 July 2020, 13:06pm IST
आपको हर दिन जिंदगी का एक इम्तिहान देना होता है, और इसके रिजल्‍ट किसी बोर्ड से जारी नहीं होते, तो नंबरों का शो ऑफ छोड़कर, वही कीजिए जो आपकी ओवरऑल ग्रोथ में मदद करता है।
अपनी कहानी, अपनी ज़ुबानी 
  • 98 Likes
जिंदगी की कामयाबी नंबरों में नहीं गिनी जा सकती। चित्र: सुषमा गुप्‍ता

नमस्कार मेरा नाम सुषमा है। पूरा नाम लिखूं तो डॉक्टर सुषमा गुप्ता।

कौन यकीन करेगा कि आठवीं में दो विषयों में फेल हो जाने और बुलिंग की शिकार होने वाली ये वही लड़की है।

दो दिन पहले ही सीबीएसई का बारहवीं कक्षा का परीक्षा परिणाम आया है। और देख रही हूं कि अखबारों, टेलीविजन से लेकर सोशल मीडिया तक सभी जगह नंबरों का शो ऑफ शुरु हो गया है। पर कभी आपने सोचा है कि सौ फीसदी नंबरों का जश्न मनाने वाले इस माहौल में कुछ बच्चे अपने साठ, सत्तर और अस्सी फीसदी नंबर लिए चुपचाप घर के किसी कोने में बैठे हैं।

कहीं आप का जश्न उन्हें और उनके माता-पिता को ग्लानि भाव से तो नहीं भर रहा? और शायद इसी जश्न से किसी की भावनाओं को आहत करने, उन्हें आत्मघाति कदम उठाने के लिए मजबूर करने की यात्रा की शुरूआत होती है।

आज मैं आपको अपनी कहानी सुनाती हूं। छठी तक घर के पास वाले छोटे से हिंदी मीडियम स्कूल में पढ़ने के बाद सातवीं में मुझे दिल्ली शहर के बहुत बड़े स्कूल कुलाची हंसराज जो कि इंग्लिश मीडियम स्कूल है, वहां शिफ्ट कर दिया गया। मुझे अभी पता चला कि सुशांत सिंह भी इसी स्कूल से पासआउट हुआ है। खैर…

नंबर ज्‍यादा आना और सभ्‍य होना दो अलग चीजें हैं। चित्र: सुषमा गुप्‍ता

जब मुझे हिंदी मीडियम से इंग्लिश मीडियम में शिफ्ट किया गया, तब मुझे ‘कीप क्वाइट’ जैसे सिंपल इंग्लिश के शब्दों तक का मतलब नहीं पता था और नतीजा यह हुआ कि मैं आठवीं में दो सब्जेक्ट में फेल हो गई। सातवीं किन नंबरों में पास की यह तो रहने ही दो।

होना पड़ा बुलिंग का शिकार

और जिस तरीके से स्कूल में मुझे साथ के बच्चे गंवार की तरह ट्रीट करते थे, नीचा दिखाते थे, मज़ाक उड़ाते थे, दोस्त बनाने से, साथ खड़ा कर देने तक से कतराते थे, ऐसा गहरा ह्यूमिलेशन जो कई सालों तक लगातार चला, जिसने मेरे मन मस्तिष्क पर गहरा असर डाला, उस अथाह पीड़ा को लिखना शब्दों में मुमकिन ही नहीं है।

मैं मन ही मन बहुत चोटिल होती, जबकि इसमें मेरी कोई गलती नहीं थी। ये वो बच्चे थे जो हमेशा अच्छे नंबर लाकर माता-पिता का प्राउड बनते थे, पर क्या वे वाकई सभ्य थे?

एक भाषा में कमज़ोर होना इस देश में आप को इस कदर नीचा दिखा सकता है, जिसकी कोई हद नहीं। पर अगर ठान लिया जाए तो फिर क्या मुमकिन नहीं।

कोई एक भाषा किसी की कमजोरी क्‍यों मान ली जाती है। चित्र: सुषमा गुप्‍ता

दसवीं में मुश्किल से शायद 60% मार्क्स आए होंगे और 12वीं तक अंग्रेज़ी सुधार ली। पागलों की तरह मेहनत की, तो 85 % के आस पास नंबर आ गए थे। कॉलेज से क्लास में टॉप करने का सिलसिला शुरू हुआ, पर बहुत जल्द समझ आ गया कि 10 नंबर किसी से ज़्यादा होना या किसी से कम होना न तो काबिल होने की निशानी है और न ही कमज़ोरी की।

मैं दुनिया की सर्वश्रेष्ठ धावक बनना चाहती हूं।
या
मैं दुनिया की सर्वश्रेष्ठ धावक को पछाड़ना चाहती हूं

आप इन दोनों पंक्तियों को ध्यान से पढ़ि‍ए। इन दोनों के नतीजे एक ही हैं पर सोच में बहुत अंतर है। जब हम नकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ते हैं, जिसमें किसी को नीचा दिखाने की भावना हो वह हमारी इंद्रियों पर बहुत बुरा प्रभाव डालती है। आगे बढ़ने की इच्छा होनी चाहिए, मेहनत पर पूरा फोकस होना चाहिए पर किसी और के साथ कंपेरिजन में कभी भी नहीं। जो भी करना है वह खुद के लिए ही करना है।

आज मैं खुद दो टीनएज बच्चों की मां हूं। मैं अपने बच्चों को भी यह कथा सुनाती रहती हूं कि इस से कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम 10वीं 12वीं में कैसे नंबर लाते हो। इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम किसी बड़े कॉलेज से पास आउट हो या किसी साधारण कॉलेज से।

फर्क इस बात से पड़ेगा कि कल को तुम अपनी ज़िंदगी को क्या उस रास्ते पर ले जा पाओगे जहां पर तुम्हें खुशी और सुकून मिल सके।

डिग्रियां दराज में और खुशी मन में रहती है

बाकी कौन सी डिग्री कौन से दराज़ में पड़ी है और उस पर कितने नंबर प्रिंट हैं, यह बेटा तुम को भी याद नहीं रहने वाला यह बात पक्की है। इसलिए नंबर की अंधी दौड़ में मत भागो। फेल होने के बाद और इतने कम नंबर लाने के बाद भी मैंने अपनी ज़िंदगी का ठीक-ठाक ही कुछ बना लिया है।
मेरे जैसे अनगिनत लोग हैं, जो फेल होने के बाद भी कुछ न कुछ तो अच्छा ज़िंदगी में कर ही लेते हैं।

नंबरों की रैट रेस का हिस्सा बनने से बड़ी ज़िंदगी की बर्बादी और कोई नहीं है। रिज़ल्ट में नंबरों का गणित दरअसल उल्टा चलता है। जितने ज़्यादा नंबर लाओगे ज़िंदगी में उतने ही प्रेशर में झोंक दिया जाओगे। M.com , MBA, LLB, PhD मुझ जैसे फेलियर के पास भी आज इतनी डिग्रियां हैं और बाद की डिग्रियां ऑलमोस्ट टॉपर की तरह है, तो इसलिए दिल छोटा करने की ज़रूरत नहीं है।

सफलता और असफलता कभी भी एक रेखीय नहीं हो सकती। चित्र: सुषमा गुप्‍ता

जिंदगी के इम्तिहान के रिजल्‍ट कोई बोर्ड जारी नहीं करता

अगर उस समय मैं फेल होने के बाद यह सोच लेती कि अब तो दुनिया ही खत्म हो गई तब क्या होता। अगर सिर्फ 85% नंबर लाने के बाद अपना मनपसंद कॉलेज न मिलने के बाद मैं निराशा में चली जाती, तब ज़िंदगी का क्या बनता! क्या वाकई वह सही होता?

नहीं बिल्कुल भी नहीं क्योंकि नंबर का खेल सिर्फ एक मानसिक दबाव बनाता है और कुछ नहीं। ज़िंदगी में कम ज़्यादा चलता रहता है। ज़िंदगी कुछ सफलताओं और बहुत सारी असफलताओं से मिलकर ही बनती है। बस मेहनत से पीछे नहीं हटना यह नहीं तो कोई और रास्ता ज़रूर खुलेगा।

मैंने एमबीए और एलएलबी करने के बाद एग्ज़ीक्यूटिव प्रोग्राम लेने शुरू किए। एमबीए के स्टूडेंट्स को इंटरनेशनल एचआर और लॉ पढ़ाया। आठ साल सिर्फ पढ़ाया ही नहीं, बल्कि अपने और भी शौक जिंदा रखे। मैंने कहीं पेंटिंग की विधिवत शिक्षा नहीं ली। पर बहुत कुछ देखकर सीखा और लगातार प्रैक्टिस कर के भी।हां कुछ पर्टिकुलर स्टाइल्स के लिए मुझे प्रोफेशनल दो या चार क्लासेज़ लेनी पड़ी जैसे स्कल्पचर। बाकी पैशन हो तो क्या नहीं सीखा जा सकता।

पांच साल एक पेंटिंग स्कूल चलाया। तकरीबन बीस तरह की मिक्स एंड मीडिया पेंटिंग्स बनानी मुझे आती हैं। शाम को दो घंटे मैं यही सिखाती थी। ग्राफिक डिजाइनिंग भी मुझे बहुत पसंद रही है। कंप्यूटर मल्टीमीडिया ग्राफिक कोर्स भी मैंने किया हुआ है।

प्राउड फेलियर से मैनेजिंग डायरेक्‍टर तक का सफर

मैंने कुछ बड़े इंटीरियर डिजाइनिंग के प्रोजेक्ट भी किए। कुछ-कुछ साल सब करके फिलहाल मैं एक मल्टीनेशनल कंपनी, हाईटेक आटोमोटिव में मैनेजिंग डायरेक्टर हूं। बचा हुआ समय साहित्य की सुंदर किताबें पढ़ने और अपने मन का लिखने में बिताती हूं।

चित्र: सुषमा गुप्‍ता

ज़िंदगी में बहुत सारी असफलताएं रहीं। बहुत बार ऐसा लगा कि बस और नहीं हो पाएगा। बहुत बार आपको जिल्लत उठानी पड़ती है, पब्लिक शेमिंग (Public shaming)। बहुत जगह जब काम सही से आप नहीं कर पाते तो सबके बीच में बहुत लताड़ भी सुननी पड़ती है। पर अगर तब मन में यह ठान लिया जाए कि मैं अब इसे और बेहतर करूंगी तो देर सवेर ही सही पर नतीजे सही ज़रूर आते हैं। फर्क बस इतना है कि हमको यह बात याद रखनी है कि जितनी बार भी गिरना है, फिर से उठना है और बार-बार उठना है।

1 Comment

  1. निःसन्देह आपके विचार प्रेरणादायी है तथा स्वस्थ जीवन के लिए अमूल्य मंत्र | आभार |

कृपया अपना कमेंट पोस्ट करें

Your email address will not be published. Required fields are marked *

अपनी कहानी, अपनी ज़ुबानी  अपनी कहानी, अपनी ज़ुबानी 

ये बेमिसाल और प्रेरक कहानियां हमारी रीडर्स की हैं, जिन्‍हें वे स्‍वयं अपने जैसी अन्‍य रीडर्स के साथ शेयर कर रहीं हैं। अपनी हिम्‍मत के साथ यूं  ही आगे बढ़तीं रहें  और दूसरों के लिए मिसाल बनें। शुभकामनाएं!