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तनाव पूर्ण रिश्‍ते में घुटते रहने से बेहतर है तलाक लेकर अलग हो जाना, ये है वंदना यादव की कहानी

Updated on: 23 November 2020, 21:25pm IST
अब भी हमारे समाज में बहू एक एसेट है। जब तक उसे मनुष्‍य नहीं समझा जाता शादियों के बाद तलाक होते रहेंगे।
अपनी कहानी, अपनी ज़ुबानी 
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क्‍यों सिर्फ लड़की के लिए ही शादी में तनाव झेलते रहना जरूरी है। चित्र: वंदना यादव

“मैं तुम्हारे साथ नहीं रह सकता तुम बहुत रिबेलियस हो, और फ़ोन कट गया।“ ये मेरे पति की आवाज थी और उसके बाद उसने मुझे ब्लॉक कर दिया। कुछ दिन बाद एक नोटिस मिला, जिसमें मेरे ऊपर अटेम्प्ट टू मर्डर, चोरी, मारपीट करने जैसे कई इल्जाम लगाए गए थे। ये सम्मन मेरे पापा के नाम पर भेजा गया था और मकसद साफ़ था – हम सब को इमोशनली कमजोर करना।

नमस्‍कार, मेरा नाम वंदना यादव है और मैं पेशे से पत्रकार हूं। 

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साल 2017 फरवरी में मेरी शादी कानपुर, मेरे होमटाउन के पास ही एक टाउन में हुई। रिश्ता लड़के वालों की तरफ से आया था। मेरे पापा इस बात से खुश थे कि लड़का भी नोएडा में ही रहता है, तो जॉब चेंज करने या जगह बदलने जैसी समस्या नहीं होगी।

मुझ जैसी आत्‍मनिर्भर लड़कियों के माता-पिता शादी में इन छोटी-छोटी चीजों पर बहुत खुश होते हैं। इसके साथ ही मेरा आग्रह था कि मैं अपनी शादी बिना किसी दहेज के करूं। यही बात हमने पहली मुलाकात में उसके परिवार वालों को बताई।

उसके पापा आर्मी से रिटायर्ड थे और परिवार भी ज्यादा बड़ा नहीं था। उस समय सब बहुत अच्‍छा लग रहा था।

क्‍या कमाने वाली बहू एक एसेट है? 

हकीकत ऐसी नहीं थी। बेटी के माता-पिता और बेटे के माता-पिता दोनों की एक रिश्‍ते से उम्‍मीदें बहुत अलग होती हैं। एक डिफेंसिव मोड में रहता है, तो दूसरा बहुत कैलकुलेटिव। हालांकि यह बात सब पर लागू नहीं होती। पर दुर्भाग्‍य से ज्‍यादातर मामलों में यही होता है।

मेरी आत्‍मनिर्भरता उनके लिए मेरा दोष थी। चित्र: वंदना यादव
मेरी आत्‍मनिर्भरता उनके लिए मेरा दोष थी। चित्र: वंदना यादव

मेरा लाइफस्‍टाइल, मेरी जॉब सब बिल्‍कुल स्‍पष्‍ट था। शादी के सप्‍ताह भर बाद ही मेरे पति अपनी जॉब पर लौट आए, मगर मुझे अभी ससुराल में ही रहना था। मैं अपनी छुट्टियां अपने नए परिवार को समझने में खर्च कर रही थी। मगर यह नया परिवार, मेरे साथ क्‍या-क्‍या नहीं आया, इसका हिसाब लगा रहा था।

बिना दहेज की शादी से उन्‍हें खासी निराशा हुई। फि‍र मुझे पति के साथ जॉइन्ट अकाउंट खोलने के लिए दबाव दिया जाने लगा। मैं हैरान हूं कि इस सलाह को न मानने पर मेरे पति भी मुझसे नाराज हो गए।

छुट्टियां ख़त्म हुईं और मैं उनके पास नोएडा आ गयी। पति मुझे देखकर ख़ास खुश नहीं था, मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि हो क्या रहा है।

हम शायद जुड़ ही नहीं पाए थे, इसलिए उन्‍हें मेरे सुख-दुख की कोई परवाह नहीं थी। फि‍र चाहें वह तन को हो या मन का।

मेरी ईवनिंग शिफ्ट, मेरे दोस्‍त, रिश्‍तेदार सब उनके लिए मसले थे और हर मसले पर हमारे घर में झगड़ा होने लगा। हर रोज तमाम कोशिशों के बाद भी मैं अपना आत्मविश्वास खोती जा रही थी।
और एक दिन झगड़ा इतना बढ़ गया कि मेरे पति ने मुझे बालकनी से धक्‍का देने की कोशिश की।

वो धक्‍का आखिरी धक्‍का था उस तनावपूर्ण रिश्‍ते के बीच जो मैंने झेला। अब मैंने इसे रिश्‍ते से बाहर आने का मन बना लिया था। आठ महीने की शादी में मुझे आर्थिक, सामाजिक, मानसिक, शारीरिक और यौन प्रताड़ना का भी शिकार होना पड़ा।

आठ महीने की शादी में मैंने बेतहाशा तनाव झेला। चित्र: वंदना यादव
आठ महीने की शादी में मैंने बेतहाशा तनाव झेला। चित्र: वंदना यादव

रिश्‍ता निभाने की शर्तें

2017 की दिवाली वाले दिन वो मुझे छोड़कर चला गया। इस रिश्‍ते में रहने की उसकी शर्तों की सूची बहुत लंबी थी। जिसमें मुझे अपने दोस्‍तों, परिवार वालों, नौकरी और शहर सब को छोड़कर उनके माता-पिता के जाकर रहना था। मैं जैसे एक पशु थी जिसका पेट भरने की कुव्‍वत उनके पास थी।

मुझ पर किए गए कानूनी हमले

मैंने इन अपमान पूर्ण शर्तों को मानने से सरासर इनकार कर दिया। क्‍योंकि जो रिश्‍ता शर्तों पर टिका हो, असल में वह रिश्‍ता होता ही नहीं है। इसके बाद मुझ कानूनी हमले किए गए। मुझ पर अटेम्प्ट टू मर्डर, चोरी, मारपीट करने जैसे कई इल्जाम लगाए गए।

यह मेरे लिए भयंकर अवसाद का समय था। मैं, मेरा कॅरियर, मेरी गृहस्‍थी सब कुछ डांवाडोल हो गया। इस सब में मेरी जिंदगी के मूल्‍यवान दो वर्ष गए। मुझमें इस कदर आत्‍मग्‍लानि भर दी गई कि मैं कुछ भी सोचने-समझने की शक्ति खोने लगी थी।

फि‍र पापा ने बढ़ाया हाथ

मैं अपनी जिंदगी के सबसे बुरे दौर से गुजर रही थी। और तब पापा ने मेरी हिम्‍मत बढ़ाई। अंतत: हमने कानूनी लड़ाई लड़ने का फैसला किया।

तीन साल के बाद आज वो लोग अपने ही केस हार चुके हैं। मेरे ऊपर लगे सारे इल्जाम झूठ साबित हुए और अब इस रिश्ते के खात्मे में जल्दी ही कानूनी मोहर भी लगने वाली है। मैं अपनी कहानी इसलिए भी बताना चाहती हूं क्योंकि इस लड़ाई में मेरे पेरेंट्स और परिवार ने मेरा बहुत साथ दिया।

थोड़ी सी समझदारी और सहयोग बेटियों का जीवन बचा सकती है। चित्र: वंदना यादव
थोड़ी सी समझदारी और सहयोग बेटियों का जीवन बचा सकती है। चित्र: वंदना यादव

अगर वो मेरे साथ न होते, तो मैं अंदाजा भी नहीं लगा सकती कि मेरे साथ क्‍या होता। अगर देश में बेटियों के मां-बाप शादी के बाद भी उनका साथ न छोड़ें, तो घरेलू अत्याचार के मामलों में कमी आ सकती है। मैं बहुत खुश हूं कि मैं एक ऐसे रिश्ते से बाहर आ गयी, जो सिर्फ लालच का था।

थोड़ी सी हिम्मत और आत्मनिर्भर होना आपके जीवन को संवारने के लिए काफी है।

तलाक मरने से हमेशा बेहतर है

कितनी ही लड़कियां घरेलू तनाव, अत्‍याचार से तंग आकर मौत को गले लगा लेती हैं। इनमें सब अनपढ़ नहीं होतीं। कुछ बहुत पढ़ी-लिखी आत्‍मनिर्भर लड़कियां भी होती हैं। कितनी ही लड़कियां सब कुछ छोड़कर अपनी गृहस्‍थी बचाने को गुमनामी के अंधेरों में खो जाती हैं। मैं समझती हूं कि ऐसे किसी भी तनावपूर्ण रिश्‍तें में घुटते रहने से बहुत बेहतर है तलाक लेकर अलग हो जाना।

क्‍योंकि एक लड़की भी मनुष्‍य है। उसे जिस तरह शादी करने का अधिकार है, उसी तरह अपने आत्‍मसम्‍मान और अपने सपनों के लिए अलग हो जाने का भी अधिकार है।

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