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बचपन में लगाए गए एमएमआर जैसे टीके गंभीर बीमारियों का मुकाबला करने में होते हैं मददगार : शोध

Published on:27 June 2020, 18:38pm IST
बेबी की वैक्सीनेशन के प्रति आपको बिल्कुल भी लापरवाही नहीं करनी चाहिए, यह नया अध्ययन बताता हैं कि यह उम्र भर आपके बच्चे के लिए सुरक्षात्मक कवच की तरह काम करते हैं।
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बचपन में लगाए गए टीके कई गंभीर बीमारियों से लड़ने में मददगार साबित होते हैं। चित्र : शटरस्टॉक

आपके बेबी के वैक्सीनेशन का टाइम हो रहा है। पर आप डर रहीं हैं कि कोरोनावायरस महामारी के समय में छोटे बेबी को बाहर ले जाना सुरक्षित है भी कि नहीं? तो हमारा आपको सुझाव है कि आप अपने बेबी को वैक्सीसनेशन के लिए जरूर ले जाएं। भले ही ये टीके खसरा जैसी साधारण बीमारियों से बचाने के लिए लगाए जाते हैं, पर यह भविष्य में बच्चे को कोरोना वायरस जैसी गंभीर बीमारियों से मुकाबला करने की भी क्षमता प्रदान करते हैं। एक अध्ययन में यह बात सामने आई है।

खसरे जैसी बीमारी को रोकने में इस्तेमाल होने वाले टीके कोविड-19 की वजह से फेफड़ों में होने वाली गंभीर सूजन को रोक सकते हैं। एक अध्ययन में यह पाया गया और यह इस महामारी से लोगों को बचाने की दिशा में नयी रणनीति साबित हो सकती है। हालांकि यह कोविड-19 का उपचार नहीं हैं, पर मुकाबला करने में मददगार हो सकते हैं।

‘एमबायो नाम के जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन के मुताबिक कमजोर रोगजनक वाले टीके प्रतिरोधक तंत्र की सफेद रक्त कोशिकाओं को असंबंधित संक्रमणों के खिलाफ अधिक प्रभावी बचाव के लिये प्रशिक्षित करने को प्रतिरोधी कोशिकाओं को सक्रिय कर सकते हैं।

बचपन में दी गई यह वैक्‍सीन कोरोनावायरस जैसी गंभीर बीमारी से लड़ने में मदद करती है। चित्र: शटरस्‍टॉक

क्‍या कहता है अध्‍ययन

अमेरिका के लुइसियाना स्टेट यूनिवर्सिटी (एलएसयू) के सदस्यों समेत अनुसंधानकर्ताओं ने प्रयोगशाला में किये गए प्रयोग में दिखाया कि जीवित कमजोर कवक तनाव के साथ टीकाकरण सेप्सिस के खिलाफ जन्मजात प्रशिक्षित सुरक्षा प्रदान करता है जो बीमारी पैदा करने वाले कवक और बैक्टीरिया का संयोजन होता है।

वैज्ञानिकों के मुताबिक असंबंधित जीवित कमजोर रोगजनक वाले टीके से मिलने वाली सुरक्षा लंबे समय तक जीवित रहने वाली प्रतिरोधी कोशिकाओं के बनती है जो पूर्व में कई प्रयोगात्मक मॉडलों में विषाक्तता युक्त सूजन और मृत्युदर को रोकने के लिये बताई गई है।

बढ़ाते हैं प्रतिरोधक क्षमता

उन्होंने कहा कि जीवित कमजोर एमएमआर (खसरा, गलसुआ, हलका खसरा-रुबेला) टीके की परिकल्पना को कोविड-19 के खिलाफ इस्तेमाल का सुझाव नहीं दिया जाता लेकिन यह महामारी के गंभीर लक्षणों के खिलाफ एक प्रतिरक्षा उपाय के तौर पर काम कर सकता है।

वैज्ञानिकों के मुताबिक सामान्य प्रतिरोधी प्रतिक्रिया वाले व्यक्तियों में एमएमआर के टीकाकरण से किसी तरह का विरोधाभास नहीं मिला और यह खास तौर पर स्वास्थ्य देखभाल कर्मियों के लिये प्रभावी हो सकता है जो आसानी से कोविड-19 की चपेट में आ सकते हैं।

हो सकता है एहतियाती उपाय

एलएसयू से अध्ययन के सह लेखक पॉल फिडेल कहते हैं, “एमएमआर जैसे बचपन में लगने वाले टीकों का इस्तेमाल वयस्कों में प्रतिरोधी कोशिकाओं को प्रेरित करने के लिये किया जा सकता है जो कोविड-19 संक्रमण से जुड़ी गंभीर जटिलताओं को खत्म या कम कर सकती हैं, जो महामारी के इस जटिल दौर में कम जोखिम और अधिक फायदे वाला ऐहतियाती उपाय हो सकता है।”

इस समय दिए गए ये टीके भविष्‍य में एंटीबॉडी के निर्माण में सहायक हो सकते हैं। Gif : giphy

फिडेल ने कहा, यह कोशिकाएं दीर्घजीवी होती हैं लेकिन आजीवन नहीं रहतीं। उन्होंने कहा, “जिस किसी का भी बच्चे के तौर पर एमएमआर का टीकाकरण हुआ होगा उसमें संभव है कि अब भी इन बीमारियों से प्रतिरक्षा के लिये एंटीबॉडी हों, लेकिन यह संभावना नहीं होगी कि उनमें सेप्सिस के खिलाफ निर्देशित प्रतिरक्षा कोशिकाएं हों।”

वे मानते हैं कि कोविड-19 से संबंधित सेप्सिस के खिलाफ बेहतर सुरक्षा के लिये वयस्क के तौर पर भी एमएमआर का टीका लगवाया जाए।

फिडेल ने कहा, “अगर हम सही हैं तो एमएमआर टीका लगवाए व्यक्ति को कोविड-19 संक्रमण से कम पीड़ा हो सकती है। अगर हम गलत हैं तोभी उस व्यक्ति को खसरा, गलसुआ और हल्के खसरे से बेहतर प्रतिरक्षा मिलेगी। इसमें किसी तरह का कोई नुकसान नहीं है।”

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