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Protein paradox : कहीं आप भी प्रोटीन मिथ्‍स की शिकार तो नहीं? समझिए क्यों जरूरी है प्रोटीन का सेवन

Published on:27 July 2020, 15:30pm IST
हाल ही में हुए एक सर्वेक्षण में यह सामने आया है कि लगभग 95 फीसदी से ज्यादा महिलाएं प्रोटीन के सेवन, उनके स्रोत और उसके महत्व के बारे में पूरी तरह नहीं जानतीं।
योगिता यादव
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ज्‍यादातर भारतीय महिलाओं को यह लगता है कि प्रोटीन की कमी से उनके स्‍वास्‍थ्‍य पर ज्‍यादा असर नहीं पड़ेगा। चित्र: शटरस्‍टॉक

क्या आपको भी यह लगता है कि प्रोटीन पचने में बहुत मुश्किल होता है? या इसकी जरूरत सिर्फ बॉडी बिल्डरों को ही होती है! तो आप भी हमारे देश की उन 95 फीसदी से ज्यादा महिलाओं में शामिल हैं जो प्रोटीन पेराडॉक्स (Protein paradox) यानी प्रोटीन विरोधाभास की शिकार हैं।

क्या है प्रोटीन पेराडॉक्स

प्रोटीन पेराडॉक्स को सामान्य शब्दों में समझें तो इसका अर्थ है कि प्रोटीन जिसकी हमारे शरीर को अधिकतम आवश्यकता होती है, उसके बारे में हमें न्यूनतम समझ है। ज्यादातर भारतीय महिलाएं असल में पुरुष भी प्रोटीन पेराडॉक्स के शिकार हैं। प्रोटीन सेवन के प्रति लोगों की जागरुकता बढ़ाने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ ने राइट टू प्रोटीन पहल की शुरूआत की है।

इसलिए है भारतीयों में प्रोटीन की कमी

प्रोटीन के बारे में प्रचलित गलत धारणाओं और प्रोटीन के स्रोतों की पहचान न हो पाने के कारण भारत में ज्यादातर लोगों में प्रोटीन की कमी पाई जाती है। जबकि 85% महिलाएं यह जानती हैं कि प्रोटीन उनके और उनके परिवार के स्वास्‍थ्‍य के लिए बहुत जरूरी है। एक नई रिपोर्ट में यह चेतावनी दी गई है कि प्रोटीन पेराडॉक्स यानी अधिकतम आवश्यकता के बावजूद न्यूनतम समझ, देश में प्रोटीन की खपत में गिरावट ला सकती है।

ज्‍यादातर महिलाएं परिवार के भोजन में प्रोटीन से ज्‍यादा प्राथमिकता विटामिन्‍स को देती हैं। चित्र: शटरस्‍टॉक

संयुक्त राष्ट्र की सार्वजनिक स्वास्थ्य जागरूकता पहल, ‘राइट टू प्रोटीन’ (Right to Protein) के लिए अग्रणी शोध संस्‍थान नीलसन के द्वारा किए गए साझा सर्वेक्षण में यह सामने आया है कि ज्यादातर भारतीय माताएं प्रोटीन की आवश्यकता को समझती हैं। इसके बावजूद मात्र 3% ही ऐसी हैं जो प्रोटीन के सेवन, स्रोत और कार्यों के बारे में पूरी जानकारी रखती हैं।

मिनी मेट्रोज की महिलाओं को भी है प्रोटीन की अधूरी जानकारी

अध्ययन में 16 भारतीय शहरों की 2,142 माताओं को शामिल किया गया। इसमें यह सामने आया कि मैक्रोन्यूट्रिएंट के रूप में 95% महिलाएं प्रोटीन के महत्व को जानती हैं। तब भी केवल 3% आबादी ही वास्तव में प्रोटीन के प्रमुख कार्यों और हर रोज उसके सेवन के महत्व को समझती है।

यह सैंपल न्यू कंज्यूमर क्लासिफिकेशन सिस्टम (NCCS) पर आधारित था। जो भारतीय परिवारों को दो वर्ग में बांटता है। पहला, परिवार के मुखिया की शिक्षा और दूसरा परिवार में शामिल सदस्यों द्वारा उपभोग की जाने वाली वस्तुओं की संख्या।

अहमदाबाद, बैंगलोर और हैदराबाद जैसे मिनी महानगरों में रहने वाले 82% लोग प्रोटीन की उचित मात्रा में सेवन और उसके फंक्शनन को समझने में असमर्थ थे। जबकि दस में से आठ माएं ऐसी हैं जो जानती हैं कि प्रोटीन का सेवन उनके दैनिक आहार में जरूरी है, फि‍र भी वह क्यों जरूरी है, यह नहीं समझ पातीं।

मांसपेशियों की सेहत के लिए भी प्रोटीन की आवश्‍यकता होती है। चित्र: शटरस्‍टॉक

अधिकांश माताओं (91%) को यह पता ही नहीं था कि प्रोटीन उनके शरीर के ऊतकों की मरम्मत, मांसपेशियों के स्वास्थ्य और इम्यूनिटी को लंबे समय तक बनाए रखनेे जैसा महत्‍वपूर्ण कार्य भी करता है।

सर विट्ठलदास कॉलेज ऑफ होम साइंस (स्वायत्तशासी) SNDTWU, मुंबई के प्रिंसीपल और भारतीय आहार संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. जगमीत मदान कहते हैं, “अध्ययन में यह भी सामने आया कि पहले से चली आ रही गलत अवधारणाओं ने लोगों की प्रोटीन की समझ को प्रभावित किया है।“

कहीं आप भी इन प्रोटीन मिथ्‍स की शिकार तो नहीं?

  1. अभी तक 70% भारतीय माताएं इस तरह के भ्रमों पर भरोसा करती हैं कि प्रोटीन को पचाना मुश्किल है, इससे वजन बढ़ता है या यह सिर्फ बॉडी बिल्डर्स के लिए जरूरी है।
  2. 85% माताओं ने बताया कि वे बच्चों सहित परिवार के सदस्यों के लिए प्रोटीन से ज्यादा विटामिन और कार्बोहाइड्रेट के सेवन को प्राथमिकता देती हैं।
  3. सबसे ज्यादा परेशान करने वाली बात यह है कि लगभग 80% महिलाओं का यह मानना है कि प्रोटीन की कमी समग्र स्वास्थ्य को प्रभावित नहीं करती!
  4. अधिकांश महिलाएं पौधे-या-पशु-आधारित प्रोटीन के सामान्य स्रोतों के बारे में भी नहीं जानतीं। वे दिखाए गए 11 में से 8 प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थों की पहचान करने में असफल रहीं।
  5. करीब 80% महिलाओं को यह गलत विश्वास है कि आहार में दाल-चावल या दाल-रोटी खाने से उनके परिवार की प्रोटीन की आवश्‍यकता पूरी हो जाती है, जिससे दालों के अलावा वे सिर्फ डेयरी प्रोडक्ट को ही प्रोटीन का स्रोत मानती हैं।
यह एक भ्रम है कि शाकाहार में प्रोटीन नहीं मिल पाता। चित्र: शटरस्‍टॉक

क्‍यों जरूरी है प्रोटीन को समझना

अभी तक ऐसे बहुत कम अध्ययन किए गए हैं, जिनमें हमारे जीवन के इस ‘प्रमुख निर्माण खंड’ के सेवन के बारे में इस तरह बात की गई हो। जबकि इस अध्ययन में प्रोटीन संबंधी बातचीत भारत में प्रोटीन की कमी और उसके सेवन की उपयोगिता पर बात की गई।

न्यूट्राक्यूटिकल इंडिया के पोषण विशेषज्ञ और निदेशक डॉ. सुरेश इटापू कहते हैं, ” प्रोटीन विरोधाभास” (Protein paradox) अध्ययन भारत में प्रोटीन के प्रति सामान्ये समझ और जागरूकता के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है। कोई भी व्यक्ति या संस्था इन जानकारियों से लाभान्वित हो सकती है। नतीजतन गुणवत्ता वाले प्रोटीन के सेवन को सुधारने के लिए सुधारात्मक उपाय कर सकती है। निश्चित रूप से यह परिवार, विशेषकर बच्चों में प्रोटीन के उचित सेवन को बढ़ा सकता है।

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योगिता यादव योगिता यादव

पानी की दीवानी हूं और खुद से प्‍यार है। प्‍यार और पानी ही जिंदगी के लिए सबसे ज्‍यादा जरूरी हैं।

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