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बच्चों को भी ज्यादा प्यारी लगती हैं वर्किंग मॉम, इमोशनली और सोशली ज्यादा स्ट्रॉन्ग होते हैं इनके बच्चे

ज्यादातर कामकाजी महिलाओं का यह गिल्ट रहता है कि वे अपने बच्चों को ज्यादा टाइम नहीं दे पातीं। पर आपकी अनुपस्थिति में वे कितने नए आइडिया को डेवलप करते हैं, यह जानकर आपको खुश हाे जाना चाहिए।
Updated On: 23 Oct 2023, 09:24 am IST
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working mom ka bachchon pr padta hai prabhaw
वर्किंग मॉम के बच्चे घर पर रहने वाली मांओं के बच्चों की तुलना में बेहतर प्रदर्शन करते हैं। यह प्रभाव बेटों और बेटियों पर बराबर रूप से पड़ता है। चित्र : अडोबी स्टॉक

वर्किंग वीमेन को दोहरी जिम्मेदारी निभानी पड़ती है। उन्हें मुस्तैद होकर ऑफिस वर्क करना पड़ता है। साथ ही, घर की सारी व्यवस्था चाक चौबंद रखनी पड़ती है। ये दोनों जिम्मेदारियां निभाते हुए न सिर्फ खुद को फिट रख पाती हैं, बल्कि मेंटल लेवल पर भी खुद को मजबूत बनाती हैं। हाल में एक शोध से यह साबित हुआ है कि वर्किंग मॉम के बच्चे बड़े होने पर अधिक खुश रहते हैं। वे घर पर रहने वाली मांओं के बच्चे की तुलना में बेहतर प्रदर्शन करते हैं (how does a working mother affect a child )। मदर्स डे (Mothers day 2023) पर मांओं के लिए यह एक अच्छी खबर है।

मनाइए मां होने का जश्न (Mothers Day celebration -14 May)

मां के कार्यों के प्रति सम्मान प्रकट करने, मैटर्नल बांड के प्रति प्यार जताने और मदरहुड को सेलिब्रेट करने के लिए मदर्स डे मनाया जाता है। यह दुनिया के कई हिस्सों में अलग-अलग दिनों में मनाया जाता है। भारत में मई महीने के दूसरे संडे को मदर्स डे (14 May) मनाया जाता है। इस वर्ष मदर्स डे की थीम मातृत्व का जश्न मनाने और विश्व स्तर पर माताओं का सम्मान करने पर केंद्रित है। इस बार इस अंतर्राष्ट्रीय दिवस का उद्देश्य मदरहुड आईडिया को पहचानना और स्वीकार करना (acknowledge the idea of motherhood) है।

कामकाजी मांओं के बारे में क्या कहता है अध्ययन (study on working mom) 

हार्वर्ड बिजनेस स्कूल के शोधकर्ताओं ने 29 देशों में 100,000 से अधिक पुरुषों और महिलाओं पर सर्वे किया। इसमें भारत की महिलाएं भी शामिल थीं। इस सर्वेक्षण का उद्देश्य यह पता लगाना था कि वर्किंग मॉम होने पर बच्चों पर क्या प्रभाव पड़ता है। वे ऑफिस में काम करने पर घर के लिए कितना समय दे पाती हैं।

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वर्किंग मॉम के बच्चे घर पर रहने वाली मांओं के बच्चों की तुलना में बेहतर प्रदर्शन करते हैं। चित्र: शटरस्टॉक

इस अध्ययन में यह बात सामने आई कि वर्किंग मॉम के बच्चे घर पर रहने वाली मांओं के बच्चों की तुलना में बेहतर प्रदर्शन करते हैं। यह प्रभाव बेटों और बेटियों पर बराबर रूप से पड़ता है। कामकाजी मांओं की बेटियां अपने आप को आत्मनिर्भर बनाने के प्रति ज्यादा बेहतर तरीके से सजग हो पाती हैं।

बच्चे मानते हैं रोल मॉडल ( role model) 

शोध में यह बात सामने आई कि कामकाजी मांओं के पास समय की कमी होती है, यह बात बच्चे भी समझते हैं। इस तरह वे समय की क्वांटिटी से ज्यादा क्वालिटी को बेहतर तरीके से समझने लगते हैं। बच्चे भी उनके साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताने के लिए तत्पर रहते हैं। वे उनकी बातों और प्रयासों को हल्के में नहीं लेते हैं। धीरे-धीरे वे उन्हें अपना रोल मॉडल मान लेते हैं

पेरेंट्स बच्चे के विकास पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालते हैं। वर्किंग मॉम के साथ एक प्लस पॉइंट यह होता है कि वे बच्चों की वित्तीय जरूरतों को पूरा कर सकती हैं। घर और बाहर के अनुभवों से लैस होने के कारण वे जीवन के किसी भी निर्णय या प्रश्न का जवाब अधिक व्यावहारिक ढंग से दे सकती हैं। वे उन्हें बेहतर ढंग से व्यावहारिक जीवन कौशल सिखा सकती हैं। बच्चे उनसे टाइम मैनेजमेंट का स्किल भी सीख सकते हैं

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पेरेंट्स बच्चे के विकास पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालते हैं। चित्र : शटरस्टॉक

बच्चे सीखते हैं आर्थिक आत्मनिर्भरता का सबक (self reliance) 

हार्वर्ड बिजनेस स्कूल के अध्ययन के निष्कर्ष इस बात पर जोर देते हैं कि वर्किंग मॉम के साथ बड़ी होने वाली बेटियां अपने घर पर रहने वाली मांओं की बेटियों की तुलना में 23 प्रतिशत अधिक कमाती हैं। वहीं यह भी पाया गया है कि जिन लडकों की मां वर्किंग होती हैं, वे अपने ऑफिस में फीमेल कलिग के साथ अधिक सपोर्टिव होते हैं। वे जेंडर इक्वलिटी में विश्वास करते हैं। वर्किंग मॉम के ज्यादातर बच्चे डे केयर में बड़े होते हैं। इसलिए उनमें सोशलाइजेशन और कम्युनिकेशन स्किल अच्छी तरह डेवलप होता है।

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लेखक के बारे में
स्मिता सिंह
स्मिता सिंह

स्वास्थ्य, सौंदर्य, रिलेशनशिप, साहित्य और अध्यात्म संबंधी मुद्दों पर शोध परक पत्रकारिता का अनुभव। महिलाओं और बच्चों से जुड़े मुद्दों पर बातचीत करना और नए नजरिए से उन पर काम करना, यही लक्ष्य है।

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