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कोरोना वायरस : आर्थिक मंदी मानसिक स्वास्थ्य को कर सकती है प्रभावित, इस तरह करें बदले हालात का सामना 

Updated on: 13 June 2020, 15:12pm IST
कोरोना ने हम सब के मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर डाला है। यहां मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य विशेषज्ञ बता रहे हैं कि कोरोना से प्रेरित इस आर्थिक मंदी का आप मानसिक रूप से कैसे सामना कर सकते हैं। 
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बेरोजगारी का डर है? पर आप निश्चित रूप से इसका ताकत के साथ मुकाबला कर सकते हैं। चित्र सौजन्य: शटरस्टॉक

कोरोना ने हम सब के मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर डाला है। यहां मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य विशेषज्ञ बता रहे हैं कि कोरोना से प्रेरित इस आर्थिक मंदी का आप मानसिक रूप से कैसे सामना कर सकते हैं। 

भारत अब अनलॉक होने के पहले पड़ाव पर पहुंच चुका है। लगभग दो महीने से ज्यादा समय के लिए कोविड-19 लॉकडाउन ने जिस मानसिक परिस्थिति में हम सबको लाकर खड़ा कर दिया है, उसे बयान नहीं किया जा सकता।

कोविड-19 और लॉकडाउन ने मेंटल हेल्थ एपिडेमिक को जन्म दिया है। जब से इस महामारी की शुरुआत हुई और लॉकडाउन शुरू हुआ तभी से लोगों में कोविड-19 का डर कम था और अपनी नौकरी जाने का खतरा सबसे ज्यादा था। 

सबसे इंटरेस्टिंग बात तो यह है ग्लोबल मेडिकल जर्नल लैंसेट के शोध में प्रकाशित स्टडी कहती है कि कोविड-19 के कारण जिस शारीरिक खतरे की तरफ हम लोग बढ़ रहे हैं, हम सबको उसका डर है इसमें कोई शक नहीं लेकिन उससे ज्यादा डर इसके साथ मिलने वाले मानसिक अवसाद से है। जो शायद कोविड-19 के खतरे से भी ज्यादा हो। इसका कारण है कि अब हम सोशल डिस्टेंसिंग के कारण एंजाइटी, डिप्रेशन, स्ट्रेस या और भी कई तरह कि नकारात्मक भावनाओं से ग्रसित हो चुके हैं। 

कोरोना ने हमारे मानसिक स्वास्थ्य पर कई तरीके से असर डाला है। लेकिन अब अगर हम सबसे अहम बात पर नजर डालें तो, वह है हमारी इक्नॉमी। जहां हम जिंदगी के कई दूसरे संघर्षों से जूझ रहे थे वहीं अब हमे इक्नॉमी के नए आर्थिक संकट से जूझना पड़ रहा है। 

इंडियन साइकाइट्री सोसाइटी ने एक शोध किया जिसमें पाया गया कि लॉकडाउन शुरू होने के पहले हफ्ते के भीतर ही मानसिक बीमारियों के केस 20% तक बढ़ गए। 

क्या मानसिक स्वास्थ्य अराजकता का कारण है?

विशेषज्ञों का मानना है कि इस महामारी के बाद सबसे ज्यादा मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ने वाला है क्योंकि इसके कारण इकोनॉमी बहुत तेजी से नीचे जाएगी। जिसका कारण होगा बेरोजगारी, शराब एम्यूज़मेंट, इकोनामिक हार्डशिप, घरेलू हिंसा, लोगों का अत्यधिक ऋण ग्रसित होना। 

यह सिर्फ वायरस ही नहीं है, यह हमारे मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर रहा है। चित्र सौजन्य: शटरस्टॉक

सर गंगा राम हॉस्पिटल में एक सीनियर  कंसलटेंट साइकोलॉजिस्ट है डॉक्टर रोमा कुमार वह हमारे साथ कुछ शेयर करती हैं, वे कहती हैं कि यह महामारी हम सबके लिए स्वभाविक नही थी हम में से कोई भी इसके लिए पहले से तैयार नहीं था। इसने हम सब पर कहीं ना कहीं असर डाला है चाहे हम बच्चों की बात करें या बुजुर्गों की अब बस पूरी दुनिया का बिजनेस बंद हो चुका है इसके कारण।

सभी को अपनी नौकरी जाने का खतरा है, आर्थिक स्थिरता खो जाने का खतरा है सबसे बड़ा खतरा है वैश्विक आर्थिक स्थिरता का खो जाना। कोई भी नहीं जानता कि आगे अब क्या होने वाला है। जो भी हो अब हमें इन्हीं हालात में जीना सीखना होगा। हमें इन्हीं हालातों से कुछ नए रास्ते खोजने होंगे और  हमें इसकी आदत डालनी ही होगी। 

बेरोजगारी की बढ़ती संभावना को दोष देना ठीक है?

इंडियन स्पाइनल इंजरी सेंटर हॉस्पिटल में एक सीनियर साइकोलोजिस्ट डॉक्टर शानू श्रीवास्तव हमें समझाते हुए बताते हैं कि मानसिक महामारी हम सबके मानसिक स्वास्थ्य पर कैसा असर डालेगी। 

वे कहते हैं, “जिन्होंने अपनी नौकरी लॉकडाउन के दौरान खो दी है, ऐसे लोग बहुत सी भावनात्मक उथल-पुथल से गुजर रहे होंगे। उनका आत्मविश्वास और आत्म-संतुलन कहीं ना कहीं उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर असर डालेगा। यदि उनको अपनी जिंदगी में कभी भी अच्छी भावनात्मक सपोर्ट की कमी रही है या अब भी है तो वह काफी सीरियस मानसिक अवसाद जैसे:-डिप्रेशन, एंजाइटी, पैनिक अटैक, स्लीपिंग डिसऑर्डर और सुसाइडल टेंडेंसीज जैसी बीमारियों से गुजर सकते हैं। 

लॉकडाउन ने मानसिक अराजकता को भी प्रेरित किया

हालांकि लॉकडाउन में एडजस्ट करना बहुत चुनौतीपूर्ण रहा है। लेकिन हम सब ने इसे अपनाया क्योंकि हमें चिंता थी इसके और अधिक विकराल रूप ना लेने की। लेकिन अब कहीं ना कहीं हम सबको चिंता है कि लॉक डाउन के बाद क्या होगा ? लॉकडाउन  के बाद की दुनिया कैसी होगी?

हालांकि शुरू में लॉकडाउन के दौरान हम सब लोगों में उलझन, चिंता और भय था कि हम सब ने अपनी जीवनशैली को जिस पैटर्न में बांधा है उसका क्या? अब बहुत से लोग उसे वापस नहीं अपना सकते थे जो कि वह शायद समझ चुके थे। 

लॉकडाउन धीरे-धीरे खुल रहा है और हम में से लोग बहुत से इसके विशेषाधिकारों को तरस सकते हैं। चित्र सौजन्य: शटरस्टॉक

डॉक्टर रोमा पोस्ट-लॉकडाउन की एक स्वाभाविक सी तस्वीर खींचते हुए कहती हैं, “अब हमारे काम करने की जगह शायद ज्यादा फ्लैक्सिबल होने वाली है, शायद हमारे काम करने के घंटों में भी कुछ कमी आए, हो सकता है कि जो हम पब्लिक ट्रांसपोर्ट और ट्रैफिक के बीच में फंसे रहते थे वह शायद पहले जैसा ना रहे। लोगों को अब अपने लिए अधिक समय मिलने लगा है। लोग मर्ज़ी से सो सकते हैं, पढ़ सकते हैं उन पर कोई प्रतिबंध नहीं है। पहले से मौजूद मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति वाले कुछ लोग अपने मूड में सुधार देख रहे हैं। यही कारण है कि लॉकडाउन खत्म हो जाने के विचार ने उन्हें परेशान कर दिया है।” 

हम अब क्या कर सकते हैं?

इन अनिश्चित हालातों को अपनाते हुए डॉक्टर रोमा बताती है हमे इन्हें कैसे संभालना होगा, वे कहती हैं हमें एक-एक करके इन चीजों से डील करना होगा, जैसे एक दिन में एक !

डॉक्टर रोमा कहती हैं कि हम बजाए की यह सोचे कि अगले कुछ महीनों में क्या होगा कैसा होगा? इसका कुछ फायदा नहीं होने वाला वे कहती हैं हमें अपना पूरा ध्यान सिर्फ आज और कल पर केंद्रित करना चाहिए क्योंकि यह उतना मुश्किल नहीं है। वे कहती हैं कि हमें इस बात को मानना पड़ेगा कि कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं जिन्हें हम कंट्रोल नहीं कर सकते। हम कंट्रोल कर सकते हैं तो सिर्फ इतना कि हम कितने और कैसे समाचारों को देखते हैं। हम यह सोचने में कितना समय बर्बाद करते हैं कि लॉकडाउन के बाद की जिंदगी कैसी होगी?”

बेरोजगारी के इर्द-गिर्द घूमती हमारी चिंता पर डॉ शानू श्रीवास्तव ने कुछ रोशनी डाली वे कहते हैं कि हमें मेडिटेशन करना चाहिए और सोचना चाहिए। उम्मीद रखनी चाहिए कि यह सब धीरे-धीरे बदल जाएगा गुजर जाएगा, यह सिर्फ बुरा वक्त है। अंत में वह कहते हैं कि अवसरों की कोई कमी नहीं है। यदि आप सकारात्मक रहते हैं तो आपके लिए अवसर हजार हैं। 

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