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कंफ्यूज हैं कि मनोवैज्ञानिक से मिलें या मनोचिकित्सक से ! सही फैसला लेने में हम कर सकते हैं आपकी मदद

Published on:2 September 2020, 17:30pm IST
लोग अक्सर मनोचिकित्सक और मनोवैज्ञानिक में कंफ्यूज हो जाते हैं और यह समझ नहीं पाते कि उन्हें किसकी मदद चाहिए। इसलिए हम बताते हैं कि आपको दोनों प्रोफेशनल्स में से किसकी जरूरत कब होती है।
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नेल बाइटिंग साइकोसेक्‍सुअल विकास में अवरोध का भी संकेत है। चित्र: शटरस्‍टॉक

आखिरकार हमारा समाज मानसिक स्वास्थ्य और रोगों के बारे में खुलकर बात कर रहा है। लोग अपनी समस्या को सामने आकर बता रहे हैं और जरूरत पड़ने पर प्रोफेशनल मदद भी ले रहे हैं। लेकिन फिर भी कई बार हम समझ नहीं पाते कि हमारी मदद कौन करेगा। हमारे मानसिक रोग के लिए किसकी मदद चाहिए- मनोचिकित्सक की या मनोवैज्ञानिक की?

ये दोनों ही मानव मस्तिष्क को पढ़ते हैं, भावनाओं, विचारों और बर्ताव की स्टडी करते हैं। फिर भी दोनों का काम करने का एरिया बिल्कुल अलग है। हम आपको बताते हैं कि आपको कब किसकी मदद चाहिए होती है।

दोनों में क्या समानता है?

मनोचिकित्सक और मनोवैज्ञानिक दोनों ही मानसिक समस्या से जूझ रहे मरीजों को देखते हैं। दोनों ही मानव दिमाग की कार्यप्रणाली को समझते हैं। यही कारण है कि लोग अक्सर मनोचिकित्सक और मनोवैज्ञानिक के बीच कंफ्यूज हो जाते हैं।

तो जानते हैं मनोवैज्ञानिक और मनोचिकित्सक में अंतर क्या है

मनोवैज्ञानिकों में मनोचिकित्सक के मुकाबले मनुष्य के दिमाग और मनुष्य के बर्ताव की ज्यादा गहरी समझ होती है।

मनोवैज्ञानिकों और मनोचिकित्सक दोनों आपकी मदद के लिए हैं। चित्र: शटरस्‍टॉक

मनोवैज्ञानिक बनने के दो तरीके होते हैं, साइकोलॉजी से ग्रेजुएशन करने के बाद आप या तो psyD यानी डॉक्टर ऑफ साइकोलॉजी या फिर Ph.D. यानी डॉक्टर ऑफ फिलोसोफी करते हैं।
मनोवैज्ञानिक साइकोलॉजी की थ्योरी, विकासात्मक मनोविज्ञान और ह्यूमन साइकोलॉजी की जानकारी रखते हैं।

वहीं दूसरी ओर, मनोचिकित्सक मेडिकल कॉलेज के बाद MD करते हैं। इसके बाद चार साल का रेसीडेंसी प्रोग्राम होता है और उसके बाद आप मनोचिकित्सक बनते हैं। मनोचिकित्सा में साइकोपैथी और मानसिक स्वास्थ्य की जानकारी होती है।

उनका मूल्यांकन का तरीका बिल्कुल अलग होता है…

सबसे बड़ा अंतर दोनों की मूल्यांकन की तकनीक और इलाज के तरीके में होता है। दोनों ही अपने मरीज की मनोस्थिति को क्लीनिकल इंटरव्यू और टेस्टिंग के द्वारा ही समझते हैं।

साइकोथेरेपी, जो एक मनोवैज्ञानिक करता है, उसमें व्यक्ति की भावनात्मक समस्याओं का निवारण होता है। इसके लिए मनोवैज्ञानिक अपनी ह्यूमन बेहवियर की समझ का प्रयोग करते हैं। साइकोथेरेपी के दौरान आप मनोवैज्ञानिक से बात करते हुए खुद को समझ पाती हैं, जिससे आपके मानसिक स्वास्थ्य में सुधार खुद-ब-खुद होता है।

मनोवैज्ञानिकों और मनोचिकित्सक दोनों के परीक्षण के तरीके में फर्क होता है। चित्र: शटरस्टॉक

वहीं ठीक इससे उलट, मनोचिकित्सक मानसिक रोगों का इलाज करते हैं। ऐसे रोग जो न्यूरोलॉजिकल सिस्टम में होते हैं। इसके लिये वे दवा का उपयोग करते हैं। मानसिक समस्या जैसे अवसाद, एंग्जायटी या तनाव का इलाज दवाओं के माध्यम से जल्दी हो सकता है। और इन दवा के लिए आपको मनोचिकित्सक की जरूरत पड़ेगी।

ऐसा कहना ठीक होगा कि दोनों के काम करने का तरीका अलग है, लेकिन अंततः दोनों ही आपके मानसिक स्वास्थ्य के लिए काम करते हैं।

तो आपको किसके पास जाना चाहिए?

आपकी समस्या का समाधान मनोवैज्ञानिक के पास है या मनोचिकित्सक के पास, यह जानने के लिए आपको उन्हीं से मिलना होगा। आपकी समस्या का इलाज कौन करेगा यह आपको एक मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक ही बता सकता है।

यह अच्छी बात है कि मानसिक स्वास्थ्य पर बढ़ती जागरूकता के कारण आप अपने फोन की एक क्लिक से किसी भी मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की मदद ले सकती हैं। किसी भी समस्या का पहला कदम है समस्या को समझना, उसका इलाज तो बाद का कदम होता है। सही तरीका है कि आप दोनों में से किसी एक से अपॉइंटमेंट तय करें और फिर वह खुद आपको बता देंगे कि आपको क्या ट्रीटमेंट की आवश्यकता है।

अंत मे सबसे जरूरी है आपका पहला स्टेप जो है समस्या को पहचानना। जब आप यह स्वीकार करते हैं कि आपको मदद की जरूरत है, आप इलाज का पहला कदम उठा चुके होते हैं।

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