क्या मोबाइल और गैजेट्स बना रहे हैं बच्चों को हाइपरएक्टिव, तो जानिए उन्हें कैसे कंट्रोल करना है

हाइपरएक्टिव बच्चे पेरेंट्स के लिए एक्स्ट्रा चुनौतियां खड़ी कर सकते हैं। हाइपरएक्टिव बच्चों की न केवल स्कूल में परफॉर्मेंस प्रभावित होने लगती है, बल्कि इसका असर उनके भाई-बहनों से रिश्ते पर भी पड़ता है।

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अपने हाइपर एक्टिव बच्चे को स्क्रीन से नहीं, उसकी मनपसंद एक्टिविटी से जोड़ें। चित्र: शटरस्टॉक
स्मिता सिंह Updated on: 22 December 2022, 14:36 pm IST
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इन दिनों बच्चों में एंग्जाइटी (anxiety) बढ़ रही है। वे हाइपर एक्टिव हो रहे हैं। सामान्य बच्चों में भी हाइपरएक्टिविटी देखी जा रही है। विशेषज्ञ बताते हैं कि इसके पीछे फोन, इंटरनेट पर अत्यधिक समय बिताना कारण हो सकता है। बच्चे खेलने की बजाय स्क्रीन पर ही लगे रहते हैं। वर्किंग पेरेंट्स के लिए यह समस्या और भी परेशान करने वाली हो सकती है। स्कूल से लौटने पर उन्हें बात करने के लिए कोई नहीं मिलता है। नतीजा वे अधिक आक्रामक हो जाते हैं। चाइल्ड साइकोलोजिस्ट गगनदीप कौर पाहवा अपनी पोस्ट में बताती हैं कि 4 टिप्स से बच्चों की अति सक्रियता को कम किया जा (How to control hyperactive children) सकता है।

पर्यावरण(environment)  और खानपान (eating habits) भी जिम्मेदार हो सकते हैं

हेल्थ साइकोलॉजी रिसर्च जर्नल में बच्चों की हाइपरएक्टिव बिहेवियर पर डॉ. अजय सिंह और उनके सहयोगियों ने रिसर्च किया। वे अपने रिसर्च में कहते हैं, हालांकि अति सक्रियता विकार (ADHD) एक जटिल विकार है। यह स्कूल गोइंग या प्री स्कूल बच्चों में विकसित होता है। इसके लक्षण एडल्ट होने पर भी दिख सकते हैं। पर्यावरण, आनुवंशिक और दवा इसके जोखिम को बढ़ा देते हैं। साथ ही खानपान की गलत आदतें, आहार में जंक फ़ूड और प्रोसेस्ड फ़ूड की अधिकता भी पर्यावरणीय प्रभाव में शामिल हो सकते हैं। फ़ूड एडिटिव, रिफाइंड शुगर और फैटी एसिड की अधिकता भी एडीएचडी लक्षणों से जुड़ी हुई हैं।

यहां हैं एक्सपर्ट के बताए 4 उपाय, जो बच्चों की हाइपर एक्टिविटी को कम कर सकते हैं (tips to control adhd child) 

चाइल्ड साइकोलोजिस्ट गगनदीप कौर बताती हैं कि 4 टिप्स से बच्चों की हाइपरएक्टिविटी को कम किया जा सकता है।

1 फिजिकल एक्टिविटी (physical activity) है सबसे अधिक जरूरी

कोरोना महामारी के दौर ने सबसे अधिक बच्चों की फिजिकल एक्टिविटी को प्रभावित किया है। बच्चे घर से बाहर निकलकर खेलने-कूदने की बजाय ऑनलाइन गेम्स से अधिक जुड़े रहते हैं। इसकी वजह से न सिर्फ उनकी फिजिकल एक्टिविटी प्रभावित हुई है, बल्कि मेंटल हेल्थ भी प्रभावित हुआ है। अति सक्रिय बच्चों की सक्रियता को कम करने के लिए सबसे पहले नियमित रूप से उनसे 40 मिनट फिजिकल एक्टिविटी करवाएं।

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अति सक्रिय बच्चों की सक्रियता को कम करने के लिए नियमित रूप से उनसे  फिजिकल एक्टिविटी करवाएं।चित्र: शटरस्टॉक

इसके अंतर्गत आउटडोर गेम्स(outdoor games) और एक्सरसाइज (exercise) भी हो सकते हैं।

2 सोने से 3 घंटे पहले हाई शुगर प्रोडक्ट (high sugar product) नहीं दें

रिसर्च से यह बात प्रमाणित हो चुकी है कि हाई शुगर मेंटल हेल्थ को प्रभावित करते हैं। बच्चे को सोने से 3 घंटे पहले हाई शुगर प्रोडक्ट देना बंद कर दें। आर्टिफिशियल शुगर से तैयार केक, पेस्ट्री या किसी भी प्रकार की ड्रिंक देना बंद कर दें।

3 सोने से 1 घंटे पहले स्क्रीन कांटेक्ट (screen contact) बंद करें

अक्सर पेरेंट्स बच्चों को सोने के लिए कहते हैं। वे खुद टीवी-मोबाइल से जुड़े रहते हैं। यदि आपको अपने बच्चों की हाइपरएक्टिविटी पर लगाम लगानी है, तो सोने से 1 घंटे पहले घर में चल रहे टीवी- मोबाइल को बंद कर दें।

स्क्रीन से आप अपना संपर्क हटा लें। टीवी- मोबाइल से निकली किरणें (ray) उनके दिमाग को प्रभावित कर सकता है। सभी मोबाइल को एक कोने में रख दें। कोई अच्छी किताब खुद पढ़ें और बच्चों को भी पढने दें। यदि बच्चा पढ़ने में आनाकानी करता है, तो उसे पढ़कर कुछ प्रेरणादायी कहानियां सुनाएं। अच्छी बातें सुनाएं।

4 हमिंग साउंड (humming sound)

पहले माएं बच्चों को लोरी सुनाकर सुलाती थीं। आजकल समय की कमी के कारण माएं लोरी नहीं सुना पाती हैं। पर आज भी यह नुस्खा नायाब है। आपका बच्चा भी जब सोने जाए, तो उसे 5-10 मिनट तक हमिंग साउंड जरूर सुनाएं। आप इस आवाज को खुद भी निकाल सकती हैं।

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बच्चों  को सुलाने के लिए उन्हें हमिंग साउंड सुनाएं । चित्र : शटरस्टॉक

यदि आप इस साउंड को निकालने में असमर्थ हैं, तो कई तरह के हमिंग साउंड मोबाइल एप पर भी उपलब्ध होते हैं। यह साउंड समुद्र की आवाज या चिड़ियों की धीमी आवाज में चहचहाहट भी हो सकती है। इससे उसका दिमाग सकारात्मक रूप से प्रभावित होगा। वह शांत हो जायेगा।

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लेखक के बारे में
स्मिता सिंह स्मिता सिंह

स्वास्थ्य, सौंदर्य, रिलेशनशिप, साहित्य और अध्यात्म संबंधी मुद्दों पर शोध परक पत्रकारिता का अनुभव। महिलाओं और बच्चों से जुड़े मुद्दों पर बातचीत करना और नए नजरिए से उन पर काम करना, यही लक्ष्य है।

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