मेरी मां की हड्डियां कमजोर हो चुकी हैं। एक छड़ी के सहारे चलते हुए वे बमुश्किल अपनी दिनचर्या निपटाती हैं। अपने हुनर और हौंसले से अपनी गृहस्थी संभाले रखने वाली मां का आत्मविश्वास उनकी हड्डियों के साथ लगातार भुरभुरा होकर झड़ रहा है। जिसका असर उनके स्वभाव में बढ़ते जा रहे चिड़चिड़ेपन के साथ महसूस किया जा सकता है। डॉक्टरों ने उनमें विटामिन डी की गंभीर कमी (Vitamin D deficiency) की पहचान की है, जिसे अब रिकवर कर पाना भी मुश्किल है। बेहतर है कि इस स्तर को और न गिरने दिया जाए। इसके लिए उन्हें अपने आहार में बदलाव और सप्लीमेंट्स की सलाह दी गई है। विटामिन डी की कमी भारत में एक साइलेंट पेनडेमिक की तरह बढ़ रही है। जिसने एक पूरी पीढ़ी की शारीरिक सक्रियता, मानसिक स्वास्थ्य और आत्मविश्वास को गहरे से प्रभावित किया है। यह महामारी आने वाली पीढ़ियों तक न पहुंचे इसके लिए समग्रता में सतत प्रयास करने होंगे।
आईसीआरआईईआर (Indian council for research on international economic relations) और एएनवीकेए (ANVKA) फाउंडेशन ने इस पर गहन शोध किया। जिसमें मौजूदा स्थिति और कारणों की पड़ताल की गई है।
प्रो. अर्पिता मुखर्जी, डॉ. आशीष चौधरी, लतिका खतवानी, त्रिशाली खन्ना और पल्लवी वर्मा के साझा प्रयास से तैयार हुई इस रिपोर्ट में भारत में विटामिन डी डेफिशिएंसी के कारणों (Causes of vitamin D deficiency) की गहन पड़ताल की गई है। शोध में पाया गया है कि हर पांचवां भारतीय विटामिन डी की कमी का शिकार है। इसमें बच्चे, बुजुर्ग, युवा सभी शामिल हैं। मगर महिलाएं इसकी सबसे ज्यादा शिकार हैं।
उनमें भी ग्रामीण महिलाओं की तुलना में शहरी महिलाओं में विटामिन डी डेफिशिएंसी का लेवल हाई है। पूर्वी भारत में स्थिति और भी खतरनाक है, जहां 39 फीसदी लाेग विटामिन डी की कमी से जूझ रहे हैं। ये बिहार, झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के वे राज्य हैं, जहां औसतन त्वचा का रंग गहरा होता है।

हारवर्ड हेल्थ की रिपोर्ट विटामिन डी डेफिशिएंसी के जिन 6 कारणों का उल्लेख करती है, उनमें एक महत्वपूर्ण कारण त्वचा का रंग भी है। गहरे रंग की त्वचा जिसमें मेलेनिन अधिक होता है, उन्हें विटामिन डी निर्माण की प्रक्रिया के लिए हल्के रंग की त्वचा की तुलना में अधिक देर धूप में रहने की जरूरत होती है। हालांकि यह केवल त्वचा का ही काम नहीं है, बल्कि इसमें लिवर और किडनी भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती हैं। इसलिए आहार के महत्व को भी नजरंदाज नहीं किया जा सकता।
बदलती जीवनशैली में लोगों का ज्यादातर समय इमारतों के अंदर बीत रहा है। फिर चाहें वह घर हो या दफ्तर। इसके साथ ही प्रदूषण की परत भी सूरज की किरणों को सही तरीके से नहीं पहुंचने देती। जिससे विटामिन डी अवशोषण का समय और गुणवत्ता दोनों प्रभावित हुई है।
धूप के अलावा विटामिन डी अन्य सभी स्रोत जैसे मछली, अंडे आदि पशु उत्पाद हैं। जिनका शाकाहारी लोग सेवन नहीं करते। फोर्टिफाइड दूध और मशरूम जिनका शाकाहारी लोग सेवन कर सकते हैं, उनकी उपलब्धता और कीमतें आम आदमी की पहुंच से दूर हैं।
जिन लोगों की त्वचा गहरी होती है, उन्हें धूप में ज़्यादा समय बिताना पड़ता है ताकि शरीर विटामिन डी बना सके। जबकि सामाजिक स्तर पर गोरेपन को लेकर जो ऑबसेशन है, उससे गेहुंए रंग की त्वचा वाले लोग भी अपनी त्वचा को धूप में जाने से बचाते हैं।
आपको जानकर हैरानी होगी, मगर यह सच है। छरहरे लोगों की तुलना में मोटापे से ग्रस्त लोगों के शरीर में विटामिन डी का प्रोडक्शन कम होता है। धीमा चयापचय भी इसके लिए जिम्मेदार है। उनमें स्वभाविक रूप से इस जरूरी विटामिन की कमी होने लगती है। इसलिए विटामिन डी का अवशोषण बढ़ाने के लिए शरीर को फिट रखने और अन्य बीमारियों से बचाने की भी जरूरत है।

देश की एक बड़ी आबादी अभी भी पोषक तत्वों की कमी से जूझ रही है। स्कूलों में बच्चों को दिए जाने वाले मिड-डे मील में भी विटामिन डी पर ध्यान नहीं दिया जाता। महंगाई तो इसका एक कारण है ही, इसके अलावा जरूरी चीजों पर लगाए गए कर भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। विटामिन डी सप्लीमेंट्स पर 18 फीसदी जीएसटी है, जो इसे और महंगा बना देता है।
देश की युवा आबादी को खोखला कर रही इस डेफिशिएंसी से निपटने के लिए अभी तक कोई स्पष्ट नीति नहीं बन पाई है। जबकि आयोडीन और आयरन के लिए प्रयास किए गए हैं।
विटामिन डी का प्रमुख स्रोत धूप है। इसलिए इसे अंग्रेजी में सनशाइन विटामिन (Sunshine vitamin) भी कहा जाता है। भारत में साल के 9 महीने अच्छी खासी धूप रहती है। जबकि अप्रैल से लेकर जुलाई तक के महीनों में तो यह इतनी ज्यादा होती है कि बचाव के लिए विशेष प्रयास करने पड़ते हैं। शोध की प्रमुख लेखक प्रो अर्पिता मुखर्जी कहती हैं, “धूप कम नहीं है, मगर धूप के प्रति संकोच लोगों में अधिक बढ़ा है। लाइफस्टाइल से सुबह जल्दी उठना और सुबह की धूप में समय बिताना लगभग विलुप्त होता जा रहा है।”
वे आगे कहती हैं, “खासतौर से महिलाएं धूप में रहना नहीं चाहतीं और रह भी नहीं पातीं। उनके पास अपने लिए समय नहीं है। वे या तो घरों के अंदर काम करती रहती हैं या दफ्तरों में। बाहर भी निकलती हैं तो मुंह ढकना जरूरी लगता है।”
धूप से परहेज एक आदत बन गई है। सूर्य की पराबैंगनी किरणें त्वचा कैंसर का कारण बन सकती हैं, यह डर लोगों के दिलों में अच्छी तरह घर कर गया है। जिससे खुद को बचाने के लिए शहरी महिलाएं सनस्क्रीन और सनप्रोटेक्शन का इस्तेमाल कर रही हैं। ज्यादातर हेल्थ रिसर्च इस बात से इनकार करती हैं कि लोग सनस्क्रीन का नियमित इस्तेमाल कर रहे हैं। मगर सनस्क्रीन का बढ़ता बाज़ार आने वाले वर्षों से बहुत आस लगाए हुए है।

ब्लूवीव कंसल्टिंगडॉटकॉम पर प्रकाशित आंकड़े बताते हैं कि भारत में 2023 में सनस्क्रीन का बाजार अनुमानित रूप से 879.12 मिलियन अमेरिकी डॉलर था। इसमें 7.15% की वार्षिक चक्रवृद्धि दर (Compound Annual Growth Rate) की वृद्धि का अनुमान लगाते हुए वर्ष 2030 तक इसके 1,256.76 मिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है।
सनस्क्रीन के बाज़ार में आए इस उछाल के पीछे लोगों का पराबैंगनी किरणों और उसके दुष्प्रभावों का डर है। बाज़ार ने यह अच्छी तरह समझा दिया है कि ये अल्ट्रा वॉयलेट रेज़ उनकी त्वचा को झुलसा सकती हैं, उन्हें समय से पहले बूढ़ा बना सकती हैं और त्वचा कैंसर का जोखिम भी बढ़ा सकती हैं। इसलिए लोग लोशन, क्रीम, जेल और स्टिक्स के रूप में इन सन प्रोटेक्शन उत्पादों का इस्तेमाल कर रहे हैं।
फोर्टिस हॉस्पिटल, शालीबार बाग में डर्मेटोलॉजिस्ट डॉ महिमा अग्रवाल कहती हैं, “फिट्ज़पैट्रिक स्केल (Fitzpatrick Scale) पर भारतीय त्वचा नंबर 3 से 5 के बीच आती है। जाे त्वचा में हल्के से गहरा भूरापन लिए हुए है। यह इसमें मौजूद मेलेनिन के कारण है। जो प्राकृतिक रूप से त्वचा को हानिकारक पराबैंगनी किरणों से बचाता है।”
डाॅ महिमा आगे जोड़ती हैं, “अपनी प्रैक्टिस के इतने वर्षों में मैंने भारत में त्वचा कैंसर का एक भी मरीज नहीं देखा। जो कि बाहरी देशों में एक गंभीर समस्या है। इसका अर्थ है कि हमें न त्वचा के झुलसने का उतना डर है और न ही मेलेनोमा (melanoma skin cancer) अर्थात त्वचा के कैंसर का। हम अगर धूप में ज्यादा समय बिताते हैं तो हमारी स्किन टैन हो जाएगी, झुलसेगी नहीं।”
हार्वर्ड हेल्थ की रिपोर्ट में कहा गया है कि सनस्क्रीन और सन प्रोटेक्शन का लगातार इस्तेमाल यूवीबी किरणों को बाधित कर विटामिन डी निर्माण की प्रक्रिया को धीमा कर देता है। जिससे शरीर में विटामिन डी की कमी हो सकती है।
आकाश हेल्थकेयर के मैनेजिंग डायरेक्टर और शोध के सह-लेखक डॉ. आशीष चौधरी कहते हैं, “सनशाइन विटामिन की कमी से न केवल हड्डियां कमजोर होने लगती हैं, बल्कि इसका असर मेंटल हेल्थ और रोग प्रतिरोधक क्षमता पर भी पड़ता है। जिससे कई और गंभीर बीमारियों का जोखिम भी बढ़ने लगता है। विटामिन डी डेफिशिएंसी की सर्वाधिक शिकार महिलाएं हैं। उनमें इसके कारण थकान, चिड़चिड़ापन, कमजोरी और अवसाद का जोखिम भी हो सकता है। जबकि बच्चों में यह रिकेट्स का कारण बन सकता है। ऑस्टियोमलेशिया एक और बोन डिजीज है जिसका कारण धूप के विटामिन की कमी है।”
विटामिन डी की कमी के संकेत आयरन और कैल्शियम की कमी के संकेतों से मिलते-जुलते हैं। इसलिए केवल संकेतों के आधार पर इसका पता नहीं लगाया जा सकता। विटामिन डी की कमी का पता लगाने के लिए टेस्ट करवाना पड़ता है। जिसकी सामान्यत: कीमत 1500 रुपये है। दुर्भाग्य से अभी तक यह न तो किसी हेल्थ इश्योरेंस में कवर किया जाता है और न ही सार्वजनिक चिकित्सालयों में यह उपलब्ध होता है। जिसके चलते इसकी पहचान, निदान और समाधान इग्नोर रह जाते हैं।

कारणों और चुनौतियों को समझते हुए यदि सरकार इस पर सख्त नीतियां बनाएं तो इस डेफिशिएंसी से निपटा जा सकता है। आयोडीन इसका उदाहरण है। 1990 तक भारत में आयोडीन की कमी से होने वाला गलगण्ड और गण्डमाला रोगों के मामले अधिक थे। इस कमी को दूर करने के लिए नमक को आयोडीन युक्त बनाया गया। केंद्र सरकार चाहें तो नीतियां बनाकर विटामिन डी को आयोडीन की राह पर घर-घर तक पहुंचा सकती है।
हालांकि यह फैट सॉल्युबल विटामिन है। इसलिए इसे दूध, तेल और घी में फोर्टिफाइड किए जाने की जरूरत है। ICRIER के निदेशक और सीईओ दीपक मिश्रा अपने अनुभवों के आधार पर कहते हैं, “भारत को आयोडीन युक्त नमक की तरह ही ज़रूरी चीज़ों में विटामिन डी जोड़ना (फोर्टिफिकेशन) होगा। साथ ही जैसे शुरुआत में राशन की दुकानों पर आयोडीन युक्त नमक वितरित किया गया उसी तरह ज़रूरतमंदों को विटामिन डी के लिए भी सब्सिडी देनी होगी।”
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