आपका मेटाबॉलिज़्म कमजोर करते हैं आर्टिफिशियल स्वीटनर्स, जानिए सेहत को कैसे पहुंचाते हैं नुकसान

क्या आप भी स्टेविया जैसे आर्टिफिशियल स्वीटनर का इस्तेमाल यह सोचकर कर रही हैं कि यह शरीर के लिए बिल्कुल भी हानिकारक नहीं हैं? तो हाल ही में हुए इस अध्ययन को ध्यान से पढ़ें।

मानव शरीर पर आर्टिफिशियल स्वीटनर के दुष्प्रभाव। चित्र: शटरस्टॉक
ऐश्‍वर्या कुलश्रेष्‍ठ Published on: 23 August 2022, 14:00 pm IST
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नॉन न्यूट्रीटिव स्वीटनर्स (Non-Nutritive Sweeteners) आजकल काफी चलन में हैं। ये स्वीटनर्स चीनी की जगह इस्तेमाल किए जाते हैं। इनकी खास बात यह होती है कि ये बिना किसी कैलोरीज़ के मीठा बनाने में मदद करते हैं। इसलिए, इन्हें शुगर सब्स्टीट्यूट या आर्टिफिशियल स्वीटनर ( Artificial Sweeteners) के रूप में भी जाना जाता है।

लेकिन आज सेल में प्रकाशित वेज़मैन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक परीक्षण से पता चलता है कि ऐसे स्वीटनर्स निष्क्रिय नहीं होते हैं: उनका मानव शरीर पर प्रभाव पड़ता है। वाकई में, इन स्वीटनर का सेवन करने के बाद शरीर का माइक्रोबायोम बदल सकता है – खरबों रोगाणु जो हमारे पेट में रहते हैं – एक तरह से जो व्यक्ति के रक्त शर्करा के स्तर को बदल सकते हैं। और इन स्वीटनर्स का प्रभाव अलग-अलग लोगों में बहुत भिन्न होते हैं।

जानिए इससे जुड़े अध्ययन में क्या सामने आया

2014 में, चूहों में वीज़मैन इंस्टीट्यूट के एक अध्ययन से पता चला है कि कुछ नॉन न्यूट्रीटिव स्वीटनर्स वास्तव में शुगर मेटाबॉलिज्म में बदलाव कर सकते हैं जो हानिकारक है। नए अध्ययन में, वीज़मैन के सिस्टम इम्यूनोलॉजी विभाग के प्रो. एरान एलिनाव के नेतृत्व में शोधकर्ताओं की एक टीम ने लगभग 1,400 संभावित प्रतिभागियों की जांच की।

आर्टीफिशियल स्वीटनर हानिकारक हैं. चित्र : शटरस्टॉक

जिनमें 120 का चयन किया गया, जिन्होनें किसी भी तरह के आर्टीफिशियल स्वीटनर वाले खाद्य पदार्थों या ड्रिंक्स का सेवन नहीं किया। इन लोगों को छह समूहों में विभाजित किया गया था। चार समूहों में प्रतिभागियों को नॉन न्यूट्रीटिव स्वीटनर्स के पाउच दिए गए, जिनमें प्रति समूह सैकरीन, सुक्रालोज़, एस्पार्टेम और स्टेविया दिये गए थे। दो अन्य समूहों को नियंत्रित रूप में मीठा दिया गया।

शोधकर्ताओं ने पाया कि सभी चार मिठास के सेवन के दो सप्ताह ने माइक्रोबायोम की संरचना और कार्य को बदल दिया। उन्होंने यह भी पाया कि दो स्वीटनर, सैकरीन और सुक्रालोज़, लोगों में ग्लूकोज टोलरेंस- यानी शुगर मेटाबॉलिज्म में काफी बदलाव आया है। इस तरह के परिवर्तन, बदले में, चयापचय रोग में योगदान कर सकते हैं। इसके विपरीत, दो नियंत्रण समूहों में माइक्रोबायोम या ग्लूकोज सहिष्णुता में कोई परिवर्तन नहीं पाया गया।

अंत में

अध्ययन से पता चला है कि नॉन न्यूट्रीटिव स्वीटनर्स हमारे माइक्रोबायोम को बदलकर ग्लूकोज प्रतिक्रियाओं को खराब कर सकते हैं। वे प्रत्येक व्यक्ति को एक अनोखे तरीके से प्रभावित करते हैं। ऐसे में इस बात पर जोर देना महत्वपूर्ण है कि यह निष्कर्ष किसी भी तरह से यह नहीं दर्शाते हैं कि चीनी की खपत, जिसे कई अध्ययनों में मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक दिखाया गया है, नॉन न्यूट्रीटिव स्वीटनर्स से बेहतर है।

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लेखक के बारे में
ऐश्‍वर्या कुलश्रेष्‍ठ ऐश्‍वर्या कुलश्रेष्‍ठ

प्रकृति में गंभीर और ख्‍यालों में आज़ाद। किताबें पढ़ने और कविता लिखने की शौकीन हूं और जीवन के प्रति सकारात्‍मक दृष्टिकोण रखती हूं।

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