मछली, दालचीनी और एल्युमीनियम टिन भी हो सकते हैं कैंसर कारक, जानिए भोजन में छुपे 6 टॉक्सिंस के बारे में 

आप जिन्हें हेल्दी फूड समझकर अपनी और अपने परिवार की डाइट में शामिल कर रहीं हैं, वही आहार प्रोस्टेट, ब्रेस्ट, लंग्स और किडनी की बीमारियों का भी कारण बन रहा है। 
मछली सहित कई भोजन हैं, जिनमें टॉक्सिक मौजूद होते हैं। चित्र: शटरस्टॉक
स्मिता सिंह Published on: 29 Aug 2022, 10:00 am IST
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क्या खाद्य पदार्थों में भी टॉक्सिंस होते हैं? सुनकर विश्वास नहीं होता है। हम जो भोजन लेते हैं, उनके लिए हम मान लेते हैं कि ये हमारे शरीर को फायदा पहुंचाएंगे, नुकसान नहीं। हालांकि भोजन और संतुलित वजन के प्रति सजग रहने वाले लोगों को कभी-कभार इसके बारे में कहते हुए आपने सुना भी होगा, पर विश्वास नहीं हुआ होगा। क्योंकि अब तक फूड पर की जा रही रिसर्च या स्टडी इस बात की पुष्टि नहीं कर पाई थी कि भोजन सामग्रियों में भी टॉक्सिंस मौजूद हो सकते हैं। पर हाल के कुछ शोध और अध्ययन इस बात पर सहमति जता रहे हैं। अलग-अलग अध्ययनों के हवाले से हम आपको बताने जा रहे हैं उन टॉक्सिंस (Toxins in foods) के बारे में जो आपके भोजन में ही मौजूद हो सकते हैं। 

यहां हैं वे 6 टॉक्सिंस जो आपके आहार में मौजूद हो सकते हैं 

अलग-अलग शोध से पता चला है कि 6 खाद्य सामग्रियों में टॉक्सिन की मौजूदगी हो सकती है।

  1 बिस्फेनॉल ए (Bisphenol A)

क्या आप डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों का बहुत अधिक इस्तेमाल करती हैं? यदि हां, तो इस बारे में सावधान होने की जरूरत है। यह केमिकल डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों और पेय पदार्थों के कंटेनर के अंदर वाली दीवारों पर पाया जाता है। 

अमेरिका की नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन पबमेड सेंट्रल में वर्ष 2017 में प्रकाशित स्टडी के अनुसार, डिब्बाबंद कंटेनर में मौजूद बिस्फेनॉल ए महिलाओं के प्लेसेंटा और भ्रूण में भी पाया गया। शरीर में इसके संग्रह से डीएनए तथा लिवर प्रभावित हो सकता है। 

भोजन या पेय पदार्थों के अंदर प्रवेश कर यह हार्मोन के रिसेप्टर साइट से जुड़कर एस्ट्रोजन की नकल कर सकता है। इससे हार्मोन का कामकाज प्रभावित हो सकता है। कुछ अध्ययन बताते हैं कि यह विकासशील भ्रूण को प्रभावित कर सकता है और प्रोस्टेट कैंसर के जोखिम को बढ़ाता है। कुछ मामलों में यह इंसुलिन रेसिस्टेंस कर टाइप 2 डायबिटीज और ओबेसिटी को बढ़ावा देता है।

इससे बचने के लिए जितना हो सके प्लास्टिक और एल्युमीनियम के बर्तनों, बाॅटल से बचना चाहिए। इनकी बजाय कांच और स्टेनलेस स्टील में पैक किए गए खाद्य पदार्थों या पेय पदार्थों का सेवन करना चाहिए।

  1. कृत्रिम वसा (Artificial Trans Fat)

यहां फिर से प्रोसेस्ड और पैकेज्ड फूड की ही बात की जा रही है। दरअसल, कई तरह के स्नैक्स जैसे कि डोनट, बेक किए गए फूड-केक, बिस्किट, पिज्जा, कुकीज, क्रैकर्स, मार्गेराइन्स को तैयार करने में आर्टिफिशियल ट्रांस फैट का प्रयोग किया जाता है।

लिक्विड वेजिटेबल ऑयल जैसे कि सोयाबीन या मूंगफली के तेल को सॉलिड बनाने के लिए हाइड्रोजन पंप का इस्तेमाल किया जाता है और यही आर्टिफिशियल ट्रांस फैट है। 

अमेरिकन हार्ट एसोशिएशन के अनुसार यह बैड कॉलेस्ट्रॉल को बढ़ाता और गुड कॉलेस्ट्रॉल को घटा देता है। इससे हार्ट डिजीज और स्ट्रोक होने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। यह इन्फ्लेमेशन का भी कारण बनती है। इस कारण से संयुक्त राज्य अमेरिका में जनवरी 2020 से कृत्रिम ट्रांस वसा के उपयोग पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया है।

  1. पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन (Polycyclic aromatic hydrocarbons)

क्या आप मीट को हाई टेम्प्रेचर पर ग्रिल कर खाती हैं और परिवार को खिलाती हैं? यदि हां, तो जान लीजिए आप भोजन की थाली में पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन जैसे टॉक्सिन को भी परोस रही हैं। हालांकि पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन (PAHs) को एन्वॉयरन्मेंट पॉल्यूटेंट माना जाता है। ऑर्गेनिक मैटीरियल को जलाने से यह प्रोड्यूस होता है। इसलिए इसकी उपस्थिति हमारे भोजन में भी है।

जब हाई टेम्प्रेचर पर मांस को ग्रिल किया जाता है या स्मोक दिया जाता है, तो फैट हॉट कुकिंग स्पेस पर टपकने लगता है, जिससे वाष्पशील पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन का उत्पादन होता है, जो रिसकर मांस में भी चला जा सकता है।

यह प्रोसेस्ड फूड में भी पाया जाता है। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन की गाइडलाइन बताती है कि इस पॉल्यूटेंट की वजह से ब्रेस्ट, किडनी, कोलन, प्रोस्टेट और लंग कैंसर होने की संभावना बनी रहती है। यदि आप लो फ्लेम पर खाना बनाएंगी, तो पीएच को 89% तक कम कर सकती हैं।

  1. दालचीनी में मौजूद कुमेरिन (Coumarin in Cinnamon)

कूमेरिन दालचीनी में पाया जाने वाला एक टॉक्सिक कंपाउंड है। इसके अधिक मात्रा में सेवन से कैंसर और लिवर डैमेज की संभावना बढ़ जाती है। यह जानना असंभव है कि दालचीनी में कितना कूमेरिन है जब तक कि आपने इसका परीक्षण नहीं किया है।

दालचीनी में मौजूद कुमेरिन हो सकता है टॉक्सिक। चित्र: शटरस्टॉक

एक अध्ययन में पाया गया है कि जो बच्चे नियमित रूप से दलिया पर दालचीनी पाउडर छिड़ककर खाते हैं, उनमें कुमेरिन का असुरक्षित स्तर हो सकता है। यदि आप नियमित रूप से दालचीनी का सेवन करती हैं, तो इसके बारे में पता होना चाहिए।

  1. एडेड शुगर (Added Sugar)

हार्वर्ड युनिवर्सिटी की स्टडी रिपोर्ट बताती है कि फूड का फ्लेवर और शेल्फ लाइफ बढ़ाने के लिए जिस एडेड शुगर का प्रयोग किया जाता है, उससे डायबिटीज, हार्ट डिजीज और कैंसर होने के खतरा अधिक हो जाता है। यदि आप प्रोसेस्ड फूड जैसे कि सॉफ्ट ड्रिंक्स, फ्लेवर्ड योगर्ट, कुकीज, केक, कैंडी, केचअप आदि का खुद इस्तेमाल करती हैं या परिवार को देती हैं, तो इसके बारे में कुछ जरूरी बातें भी जान लें।

एडेड शुगर को एंप्टी कैलोरी भी कहा जाता है। इस चीनी में मौजूद हाई फ्रुक्टोज मोटापा, टाइप 2 डायबिटीज, मेटाबॉलिज्म सिंड्रोम, फैटी लीवर डिजीज और कैंसर के जोखिम को बढ़ा देता है। एडेड शुगर का सेवन कम करने के लिए शुगर वाले पेय पदार्थ और डिब्बाबंद फ्रूट जूस को सीमित करें। बहुत कम मात्रा में प्रोसेस्ड स्नैक्स और डेजर्ट खाएं।

  1. मछली में मौजूद पारा (Mercury in Fish)

मछली हेल्दी एनिमल प्रोटीन है, लेकिन गहरे समुद्र में पाई जाने वाली मछलियों की कुछ किस्मों में हाई लेवल मर्करी या पारा पाया जा सकता है। यह एक जाना-पहचाना टॉक्सिक कंपाउंड है। जल प्रदूषण के कारण यह टॉक्सिन समुद्र में मौजूद खाद्य श्रृंखला में अपनी पहुंच बना लेता है। 

पारा-दूषित पानी में उगने वाले पौधों को छोटी मछलियां खाती हैं, जिन्हें बाद में बड़ी मछलियां खा जाती हैं। समय के साथ पारा उन बड़ी मछलियों के शरीर में जमा हो जाता है। इन मछलियों को खाने से यह पारा मनुष्यों तक पहुंच बना लेता है। पारा एक न्यूरोटॉक्सिन है, जिसका अर्थ है कि यह मस्तिष्क और तंत्रिकाओं को नुकसान पहुंचा सकता है। 

पारा भ्रूण और शिशु के तंत्रिका तंत्र के विकास को प्रभावित कर सकता है

शोध से पता चलता है कि छोटे बच्चों और गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को विशेष रूप से इसका जोखिम अधिक होता है। यह पारा भ्रूण और शिशु के मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र के विकास को प्रभावित कर सकता है। किंग मैकेरल और स्वोर्डफिश में पारा अत्यधिक मात्रा में पाया जाता है। सैल्मन, पोलक, हेरिंग और कैटफिश में कम पारा पाए जाने के कारण इन्हें खाया जा सकता है।

मछली में मौजूद पारा भ्रूण और शिशु के नर्वस सिस्टम को प्रभावित कर सकता है। चित्र शटरस्टॉक।

जोखिम को कम करने के लिए जितना हो सके डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों, ट्रांस फैट और एडेड शुगर का प्रयोग कम करें।

 

लेखक के बारे में
स्मिता सिंह

स्वास्थ्य, सौंदर्य, रिलेशनशिप, साहित्य और अध्यात्म संबंधी मुद्दों पर शोध परक पत्रकारिता का अनुभव। महिलाओं और बच्चों से जुड़े मुद्दों पर बातचीत करना और नए नजरिए से उन पर काम करना, यही लक्ष्य है। ...और पढ़ें

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